तारीफ़ के काबिल है सौम्या की हिम्मत

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भारत की सभ्यता दुनिया में सबसे प्राचीन है और तमाम आक्रमणों और युद्धों के बाद भी आज भी अक्षुण्ण है। पुराने समय में भारत के राजा-महाराजा मनोरंजन के लिए अनेक साधनों का प्रयोग किया करते थे जैसे नाच-गाना, शिकार और खेल। मनोरंजन के इन प्रकारों से कला का जन्म होता था जैसे गायन, नृत्य, युद्धकला और इससे खेलों में माहिर खिलाड़ियों की प्रतिभा निखरती थी। दुनिया को जब अक्षर ज्ञान भी नहीं था तब हमारे पास हड़प्पा जैसी उन्नत संस्कृति थी और नालंदा, तक्षशिला जैसे महाविद्यालय थे। भारत खेलों के मामले में भी कभी पीछे नहीं रहा और शतरंज जैसे दिमागी खेल का जन्मदाता भी भारत ही है। शतरंज का जन्म भारत में आज से कम से कम 1500 साल पहले हुआ था।

शतरंज की एक कहानी मशहूर है कि इसके अविष्कारक ने जब पहली बार किसी राजा को यह खेल दिखाया तो राजा खूब खुश हुए और बोले, तुम जो चाहे मुझसे मांग लो। शतरंज जैसे शानदार खेल के आविष्कारक भी स्वाभाविक तौर पर तीक्ष्ण बुद्धि वाले थे। उन्होंने राजा से कहा – “महाराज इस खेल के बदले मुझे कुछ स्वर्ण मुद्राएं दे दी जाएं|” राजा ने कहा – ठीक है, बताओ कितनी स्वर्ण मुद्राएं चाहिए तुम्हें ? तब उन्होंने कहा – महाराज ! शतरंज के हर खाने में पहले वाले खाने से दोगुनी मुद्राएं रखकर दे दीजिए यानी पहले खाने पर 1 स्वर्ण मुद्रा, दूसरे पर 2, तीसरे पर 4, चौथे पर 8 ऐसे इन 64 खानों का हिसाब कर दीजिए।

पहले तो महाराज थोड़े क्रोधित हुए कि तुमने इतनी कम स्वर्णमुद्राएं मांगी, लेकिन जब 64 खानों का हिसाब किया गया, तब राज्य के बड़े से बड़े गणितज्ञ भी चक्कर खा गए। मुद्राएं इतनी थी कि पूरा राजकोष ही खाली हो गया। भारत की दुनिया को देन इस खेल की बात आज इसलिए जरूरी हो गई है क्योंकि ईरान में होने वाली शतरंज की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में सभी प्रतिभागियों को हिज़ाब पहनने की अनिवार्यता लागू कर दी गई है। इस गैर-जिम्मेदाराना फैसले के विरोध में भारत की शतरंज खिलाड़ी सौम्या स्वामीनाथन ने भाग लेने से इनकार कर दिया है।

सौम्या के इस समझदारी और बहादुरीपूर्ण निर्णय की मुक्तकंठ से प्रशंसा की जानी चाहिए क्योंकि हिज़ाब पहनकर शतरंज खेलना न सिर्फ व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है बल्कि शतरंज जैसे दिमागी खेल का भी अपमान है। आप जाहिल मुल्क हैं कोई बात नहीं, आप अपनी महिलाओं के साथ जो सलूक करते हैं, वह दुनिया देखती है, लेकिन अपनी इस जाहिलियत और मूर्खता को सिर्फ अपने मुल्क तक ही सीमित रखना चाहिए न कि उन्नत देशों की महिलाओं को अपनी इस बेवकूफी में शामिल करने की कोशिश करना चाहिए।

सवाल है जब क्रिकेट में कितने ही मुस्लिम खिलाड़ी लंबी दाढ़ी रखकर खेलते हैं तब कोई आपत्ति नहीं है तो जबर्दस्ती हिज़ाब पहनाने का हिटलरी फरमान जारी करने का हक ईरान सरकार को किसने दे दिया? ईरान, पाक, सीरिया और सऊदी जैसे मुल्कों को शतरंज खेलने का कोई नैतिक हक नहीं है क्योंकि बुद्धि और दिमाग के खेल में जाहिलों का कोई स्थान नहीं है। सौम्या की तारीफ इसलिए भी की जानी चाहिए क्योंकि जब भारत की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ईरान गई थी, तब उन्होंने भी सिर पर शाल ढंककर मुलाकातें की थी।

इसलिए कहना गलत नहीं होगा कि जो हिम्मत भारत की विदेश मंत्री भी नहीं दिखा सकी , वह काम सौम्या ने कर दिखाया है। भारत में असहिष्णुता का ढोल बजाने वाले बुद्धिजीवियों को इस वक्त सौम्या का साथ देना चाहिए क्योंकि वो इस वक्त मजहबी असहिष्णुता का शिकार हो रही है। मोहम्मद कैफ ने ट्वीट करके सौम्या का समर्थन किया है। देखतें है कितने बुद्धिजीवी सौम्या का साथ देने आगे आते हैं?

-सचिन पौराणिक

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