मन में कुछ और, बाहर कुछ और

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कहते हैं हाथी के दांत दिखाने के अलग होते हैं और खाने के अलग। सच भी है हाथी के सामने वाले दांत सिर्फ औरों को दिखाने के काम आते हैं, भोजन चबाने के लिए अंदर के दांत काम आते हैं, लेकिन वे किसी को दिखाई नहीं देते हैं। ऐसे ही दांत नेताओं के भी होते हैं, जो जनता के सामने एक अलग रूप में पेश आते हैं और हकीकत में उनके मन में कुछ और ही चल रहा होता है। बानगी के तौर पर नरेंद्र मोदीजी को ही देखिए, 2014 के चुनावों से पहले लगता था कि इधर मोदीजी प्रधानमंत्री बने और उधर राम मन्दिर निर्माण कार्य शुरू हो जाएगा, लेकिन 4 साल से ज्यादा समय बीत चुका है|

मंदिर निर्माण का जिक्र कोई भी भाजपा नेता नहीं करना चाह रहा है। कई नेता यह तक कहते दिखे कि हमने मंदिर निर्माण का वादा किया ही नहीं था। खैर, नेताओं का काम है राजनीति करना और वे चाहे इंसान के नाम पर करें चाहे भगवान के नाम पर, करेंगे ज़रूर। कल सुप्रीम कोर्ट ने प्रमोशन में आरक्षण को हरी झंडी दिखलाते हुए साफ कर दिया कि यदि राज्य सरकारें चाहे तो इसे लागू कर सकती हैं।

मध्यप्रदेश के आरक्षण प्रिय मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान इस फैसले से मन ही मन गदगद हो उठे होंगे, लेकिन चुनावी साल में वे अपनी खुशी का खुलकर इजहार नहीं कर पा रहे हैं। ऊपर से आलाकमान का भी हुक्म आ चुका है कि इस मुद्दे पर पूरी तरह चुप्पी बरती जाए क्योंकि इस फैसले का समर्थन किया तो सामान्य वर्ग नाराज़ हो जाएगा (जो कि पहले ही एट्रोसिटी एक्ट पर सरकार के खिलाफ खुलकर सामने आ चुका है) और विरोध किया तो आरक्षित वर्ग नाराज़ हो जाएगा। ऐसी परिस्थिति सरकार के लिए “न उगलते बने न निगलते” वाली हो चुकी है, लेकिन सिर्फ चुनाव होने तक। एक बार कैसे भी जनता उन्हें चुन लें, उसके बाद अगले 5 साल वे फिर अपनी मनमर्जी पर आ जाएंगे।

ग़ौरतलब है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान आरक्षण पर अपने बयानों को लेकर वैसे ही सामान्य वर्ग के निशाने पर रहते हैं। उनका हालिया बयान कि “कोई माई का लाल आरक्षण नहीं हटा सकता” इतना विवादित हो चुका है कि सामान्य वर्ग में उनके खिलाफ भारी आक्रोश पनप चुका है। सपाक्स और करणी सेना द्वारा उज्जैन में किए गए आंदोलन में जनता की बड़े पैमाने पर मौजूदगी से पहले ही सरकार के कान खड़े हो चुके हैं इसलिए इस बार वो कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाह रहे हैं।

असली सवाल यह है कि क्या जनता को हक़ नहीं है यह जानने का कि प्रमोशन में आरक्षण को लेकर सरकार का आधिकारिक मत क्या है? सुप्रीम कोर्ट द्वारा जब यह तय कर दिया गया है कि पदोन्नति में आरक्षण राज्य सरकारों का विषय है, तब मध्यप्रदेश सरकार इसे लागू करेगी या नहीं? इस प्रकार की चुप्पी से सरकार की मंशा पर सवाल उठने बिल्कुल लाज़िमी है। जनता को यह समझना चाहिए कि यह चुप्पी हाथी के दिखाने के दांत हैं। इनके असली दांत चुनाव के बाद महसूस होंगे, जब ये जनता को चबाना शुरू करेंगे।

अब यह जनता को चाहिए कि हर दल के छोटे-बड़े नेता से पूछें कि अगर-मगर छोड़कर साफ शब्दों में बताइये कि आपकी पार्टी का इस फैसले पर क्या मत है क्योंकि इस लड़ाई में बीच का कोई रास्ता नहीं है या तो आप आरक्षण के पक्ष में है या फिर इसके खिलाफ। नेतागण जनता को मूर्ख बनाने के लिए कई दलीलें देंगे, लेकिन अब जनता को सवाल पूछने के लिए तैयार हो ही जाना चाहिए। जनता के अच्छे दिन आए चाहे न आए, लेकिन जिस दिन जनता सवाल पूछना सीख गई, उस दिन से नेताओं के बुरे दिन शुरू होना पक्का है।

-सचिन पौराणिक

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