धर्म के साथ मानवता की भी बदनामी

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हिन्दू और यहूदी दो ऐसे धर्म हैं, जिन्होंने कभी किसी अन्य मत को मानने वाले पर धर्मांतरण के लिए दबाव नहीं बनाया। हिन्दू धर्म विश्व का सबसे प्राचीनतम धर्म है| यहूदियों की तादाद भी पहले बहुत थी, लेकिन अपने धर्म के प्रति समर्पित किंतु दूसरे धर्मों के प्रति उदार भाव रखने का दुष्प्रभाव यह हुआ कि हिन्दू आज केवल भारत तो यहूदी सिर्फ इज़राइल में सिमट चुके हैं। भारत में भी आज कई राज्य ऐसे हैं, जहां हिन्दू अल्पसंख्यक हो चुके हैं। इज़राइल भी चारों तरफ से दुश्मनों से ऐसे घिरा हुआ है, जो किसी भी कीमत पर उसकी बर्बादी चाहते हैं।

इसके उलट इस्लाम और ईसाई धर्म ने सदा से धर्मांतरण को ही सीढ़ी बनाकर अपने धर्म का प्रचार किया। इस्लाम ने जहां जोर-जबरदस्ती और तलवार के दम पर अपना प्रसार किया वहीं ईसाइयों ने सेवा की आड़ लेकर लोगों का धर्म बदला। भारत के आदिवासी अंचलों में आज भी मिशनरी वाले गरीब बच्चों को एक डिस्प्रिन की गोली देकर बदले में उनके गले में क्रॉस पहना रहे हैं। ईसाई संस्थानों की इस कथित सेवा भावना के पीछे हमेशा उनका मूल उद्देश्य धर्मांतरण ही रहता है। सेवा सनातनियों ने भी बहुत सेवा की और ईसाई संस्थानों से ज्यादा ही की, लेकिन आज तक के इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं रहा, जहां किसी सनातनी ने सेवा के बदले किसी से उसके धर्म का सौदा किया हो। ईसाई मिशनरियों के ऐसे अनेक कुकर्म सामने आ चुके हैं, जिनमें वे सेवा की आड़ लेकर धर्मांतरण सहित कई गैरकानूनी काम करते रंगे हाथों पकड़ा चुके हैं इसलिए कुछ मिशनरी, जो सच में सिर्फ सेवा केंद्रित है, उन पर भी जनता का शक बना रहता है।

ऐसी ही एक घटना कल सामने आई, जब रांची के ईस्ट जेल रोड स्थित एक संस्था ‘मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी’ पर नवजात बच्चों को बेचने का आरोप लगा। दरअसल, मानव तस्करी से मुक्त कराई गई अविवाहित गर्भवती लड़कियों को यह संस्था अपने यहां आश्रय देती थी। इन लड़कियों की सारी जानकारी संस्था को बालकल्याण समिति अर्थात चाइल्ड वेलफेयर कमेटी ( सीडब्ल्यूसी) को देनी होती है। इस संस्था में आश्रय पाने वाली एक नाबालिग गर्भवती को जब प्रसूति के लिए अस्पताल ले गए, तब यह जानकारी उन्होंने सीडब्ल्यूसी से छिपा ली। इसके बाद नाबालिग से बच्चे को यह कहकर ले लिया गया कि इसे कोर्ट में पेश करना है, लेकिन कोर्ट ले जाने के बजाय महज 1.20 लाख में उस 4 दिन के नवजात का सौदा कर दिया गया।

महिला द्वारा जब अपना बच्चा मांगा गया तो उसे कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया, जिससे तंग आकर उसने इसकी शिकायत बालकल्याण समिति से की, जिसके बाद पुलिस की मदद से मिशनरी ने कई गिरफ्तारियां की। दोषी सिस्टर ने अपना गुनाह कबूल करते हुए बच्चा बेचने की बात स्वीकार कर ली। जांच में इसी तरह गैरकानूनी तरीके से और भी बच्चों को बेचने की बात का खुलासा हुआ है। इन सबके बीच असली सवाल यह है कि यदि मिशनरीज़ नाबालिग गर्भवती लड़कियों को आश्रय के लिए अपने यहां रहने दे रहे हैं और बदले में उनके बच्चों को बेच रहे हैं, तब इसमें सेवा आखिर कहां है? आश्रय के बदले बच्चों का सौदा मानव तस्करी है या सेवा? क्या सभी मिशनरीज़ सेवा की आड़ में ऐसे ही गोरखधंधे कर रही है?

मानव सेवा आपका लक्ष्य है या फिर धर्मांतरण और मानव तस्करी? आखिर ऐसी सेवा का क्या तुक, जिसके पीछे पुनीत भावना नहीं बल्कि फरेब छिपा हो? धोखे या छल से पूरी दुनिया को अपने ही धर्म का अनुयायी बनाकर भी आखिर क्या हासिल होगा? इस्लाम और ईसाइयत दोनों को एक बार रुककर सोचना चाहिए कि एक बगिया में अलग-अलग फूल बेहतर दिखाई देते हैं या एक ही जैसे फूल? एक रंग की कूची लेकर आखिर क्यों पूरी दुनिया को उसी रंग में रंगने की कोशिश की जा रही है? लव जिहाद की तरह यह क्या कोई ‘सेवा जिहाद’ छेड़ रखा है मिशनरियों ने? ऐसे समय मे जब धर्म के प्रचार के लिए एक अंधी दौड़ चल रही है, तब हिन्दू और यहूदियों की तारीफ की जानी चाहिए, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी मानवता के बुनियादी सिद्धांतों का साथ कभी नहीं छोड़ा। कोई भी धर्म-मजहब कभी छल-कपट का समर्थन नहीं करता है, लेकिन गलत व्याख्याओं और ऐसी हरकतों के कारण कुछ धर्मों के साथ ही मानवता की बदनामी भी हो रही है।

-सचिन पौराणिक

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