शाहीन बाग से ज़्यादा सुधीर और दीपक के मामले ने पकड़ा तूल

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डेढ़ महीना हो गया शाहीन बाग़ आंदोलन (CARTOON ON SHAHEEN BAGH PROTEST)  को लेकिन प्रदर्शनकारियों ने न आंदोलन खत्म किया और न ही सड़क खाली करने को तैयार है। बल्कि ऐसा लग रहा है कि ये आंदोलन बढ़ता ही जा रहा है। कल दो मीडिया हाउस के संपादक शाहीन बाग (Shaheen Bagh) प्रदर्शन कवर करने पहुंचे लेकिन वहां उन्हें तीव्र विरोध झेलना पड़ा। इन्हें देखकर वहां ‘गो-बेक’ के नारे लगाए और बाग में घुसने नही दिया गया।प्रदर्शनकारी हालांकि सभी पत्रकारों, संपादकों के साथ ऐसा नही करते। कुछ पत्रकारों को बाकायदा शाहीन बाग़ (CARTOON ON SHAHEEN BAGH) में ससम्मान मंच पर बुलाया जाता है और एक धड़े के पत्रकारों को घुसने भी नही दिया जाता। पत्रकारों में दो धड़े बनना अच्छा संकेत नही है। क्योंकि एक धड़ा सरकार के सुर में सुर मिलाता है तो दूसरा सरकार का हमेशा विरोध करता है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ये दोनों धड़े खतरनाक है।पत्रकार ऐसे होने चाहिये जो धड़ेबाज़ी से दूर रहे, जिनका संघ कार्यालय में भी स्वागत हो और शाहीन बाग में भी। लेकिन वर्तमान में किसी मीडिया हाउस में, किसी चेनल में ऐसा पत्रकार नही जो निष्पक्ष कहा जा सके।

Talented View : सम्मान की जात

बहरहाल, पत्रकारों की खेमेबाजी से ज्यादा देश शाहीन बाग जैसे आंदोलनों (CARTOON ON SHAHEEN BAGH PROTEST) से ज्यादा दुखी है। अराजक भीड़ ने डेढ़ महीने से सड़क पर कब्ज़ा कर रखा है और कोई सरकार सड़क खुलवाने में रुचि नही ले रही है।शाहीन बाग में मुस्लिमों ने अपनी महिलाओं, बच्चो को प्रदर्शन में बैठा दिया है। उन बेचारों को न नागरिकता कानून की कोई समझ है और न ही प्रदर्शन का उद्देश्य पता है। भीड़ बढ़ाने के लिए उनका इस्तेमाल किया जा रहा है। बच्चों के दिमाग मे जो जहर भरा जा रहा है उसके परिणाम विघटनकारी और विस्फोटक होंगे। बच्चों के दिमागों में जहर की खेती की फसल निस्संदेह बहुत जहरीली होगी।शरजील इमाम के बयान से समझा जा सकता है कि इनके इरादे कितने खतरनाक है। उत्तर-पूर्व के राज्यो को भारत से अलग करने की साजिशें रची जा रही है और बाकायदा इसकी सार्वजनिक घोषणा की जा रही है। पूरे देश मे हजारों शाहीन बाग बनाने की तैयारी चल रही है। लेकिन दुर्भाग्य ये है कि सरकारें इतने संवेदनशील मामले में भी राजनीति करने से बाज़ नही आ रही है। शाहीन बाग़ चूंकि दिल्ली में है और दिल्ली में अगले महीने चुनाव है इसलिए इस मामले को भी वोटों के तराजू में तोला जा रहा है।ग्रह मंत्रालय इस विरोध के पीछे फंडिंग के आंकड़े सार्वजनिक कर रहा है लेकिन इन्हें सड़क से हटाने को तैयार नही है। इधर विपक्ष के नेता भी शाहीन बाग जाकर आंदोलन की आग में पेट्रोल तो छिड़क रहे है लेकिन खुद के सत्ता में आने पर इस कानून को वापस लेने की बात पर शातिराना चुप्पी साधे हुए है। शाहीन बाग (CARTOON ON SHAHEEN BAGH) की आग अभी और भड़काई जाएगी, फिर इस पर राजनीतिक रोटियां सेंकी जायेंगी और वोटों का बंटवारा कर लिया जायेगा। चुनाव नतीजे आने के बाद नई सरकार बनेगी उसके बाद इस मुद्दे को सुलझाने के संजीदा प्रयास किये जायेंगे। तब तक जो हो रहा है उसका भावनाओ को काबू में रखकर आनंद लीजिये।

शाहीन बाग़ vs गोदी मीडिया | Shaheen Bagh angry with TV media | Talented View

डेढ़ महीना हो गया शाहीन बाग़ आंदोलन को लेकिन प्रदर्शनकारियों ने न आंदोलन खत्म किया और न ही सड़क खाली करने को तैयार है। बल्कि ऐसा लग रहा है कि ये आंदोलन बढ़ता ही जा रहा है। कल दो मीडिया हाउस के संपादक शाहीन बाग प्रदर्शन कवर करने पहुंचे लेकिन वहां उन्हें तीव्र विरोध झेलना पड़ा। इन्हें देखकर वहां 'गो-बेक' के नारे लगाए और बाग में घुसने नही दिया गया। प्रदर्शनकारी हालांकि सभी पत्रकारों, संपादकों के साथ ऐसा नही करते। कुछ पत्रकारों को बाकायदा शाहीन बाग़ में ससम्मान मंच पर बुलाया जाता है और एक धड़े के पत्रकारों को घुसने भी नही दिया जाता। पत्रकारों में दो धड़े बनना अच्छा संकेत नही है। क्योंकि एक धड़ा सरकार के सुर में सुर मिलाता है तो दूसरा सरकार का हमेशा विरोध करता है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ये दोनों धड़े खतरनाक है। #ShaheenBagh #ChandrashekharAzad

Talented India News द्वारा इस दिन पोस्ट की गई मंगलवार, 28 जनवरी 2020

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Sachin Puranik

 

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