सुरक्षा बलों की मनःस्थिति पर बुरा असर पड़ेगा

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किन्नर अक्सर खूब श्रृंगार करते हैं| कहते हैं नारी से भी ज्यादा श्रृंगार एक किन्नर कर लेता है क्योंकि वह खुद को ज्यादा सुंदर दिखाना चाहता है। इस चक्कर में वह अपने शरीर के साथ भी अन्याय कर लेता है, लेकिन सुंदर दिखने का मोह नहीं छोड़ पाता है। जो सच में स्त्री है, उसे अपने बारे में पूरा भरोसा है इसलिए यदि वह थोड़ा श्रृंगार कम करे या न भी करे तो कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन किन्नर को पता होता है कि वह असल में  नारी नहीं है इसलिए खुद के असल व्यक्तित्व को छिपाने के लिए वह अत्यधिक श्रृंगार का सहारा लेता है।

रमज़ान का पवित्र महीना चल रहा है और कल रात को ही राष्ट्रीय राइफल्स के कैम्प पर फिदायीन हमला हुआ है| जब से भारत सरकार ने इस महीने में एकतरफा संघर्षविराम का ऐलान किया है, आतंकी संगठनों ने एक नई ऊर्जा और जोश के साथ काम शुरू कर दिया है। सेना द्वारा चलाए जा रहे ऑपरेशन ऑलआउट की अभूतपूर्व कामयाबी से जो आतंकवादी डर के मारे कांपने लगे थे, अब वही आतंकी खुलकर सेना और सुरक्षाबलों पर हमला कर रहे हैं।

इस एकतरफा संघर्षविराम के बारे में देश के रक्षा विशेषज्ञ एक सुर में कह रहे हैं कि यह गलत है| इससे सुरक्षाबलों की मनःस्थिति पर बुरा असर पड़ेगा, लेकिन नए-नए सेक्युलर बने केंद्र के नेता कुछ समझने को तैयार नज़र नहीं आ रहे हैं। कल रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण को स्पष्टीकरण देना पड़ा कि संघर्षविराम के बाद भी किसी उकसाने वाली कार्रवाई का देश के सुरक्षाबल करारा जवाब देंगे, लेकिन सवाल यह है कि रक्षामंत्री को आखिर यह सफाई क्यों देना पड़ी ? सशस्त्र बलों के संघर्षविराम से जहां आतंकवादियों के हौसले बुलंद हुए हैं वहीं पाकिस्तान की तरफ से भी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर लगातार गोलाबारूद दागा जा रहा है ?

इसी महीने सुरक्षा बलों और पुलिस के अलावा आतंकवादियों ने कश्मीर की आम जनता पर भी कई बार ग्रेनेड हमले किए हैं। आतंकवादी इस संघर्षविराम के मौके का भरपूर फायदा उठाते हुए हमला करने का एक मौका भी नहीं छोड़ रहे हैं। जुम्मे की नमाज के बाद सब पत्थरबाज मिलकर सेना की गाड़ियों पर सुनियोजित हमले कर रहे हैं और सुरक्षाबलों को यह अधिकार भी नहीं है कि आत्मसुरक्षा के लिए वे इन पर गोलियां चला सकें। ऐसे में यह समझ के बाहर है कि इस संघर्षविराम से सरकार आखिर क्या हासिल करना चाहती है?

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब एक मुस्लिम राष्ट्र होकर भी पाकिस्तान रमज़ान के महीने में गोलीबारी से परहेज़ नहीं कर रहा ? जुम्मे की नमाज के बाद पत्थरबाज पत्थर फेंकने से बाज़ नहीं आ रहे ? जब इस्लामिक आतंकवादी बेगुनाह नागरिकों का खून बहाने से नहीं चूक रहे तो यह धर्मनिरपेक्ष सरकार आखिर मज़हब के नाम पर क्यों संघर्षविराम का झुनझुना बजाने पर तुली है ? इन सबके बीच यक्ष प्रश्न है कि यदि आतंकवाद का कोई मज़हब नहीं होता तो रमज़ान के महीने में यह एकतरफा संघर्षविराम क्यों?

मुस्लिमों के लिए यह बात कांच की तरह साफ है कि उनका क्या लक्ष्य है और उसे कैसे हासिल करना है, लेकिन जरूरत से ज्यादा सेक्युलर बनने के चक्कर में यह सरकार हिजड़ों की तरह कुछ ज्यादा ही श्रृंगार करने में लगी है। जब उन्हें रमज़ान में खून-खराबे से कोई आपत्ति नहीं है तो आपको पहली गोली चलाने में क्या दिक्कत आ रही है ? इतने सालों से आतंक का दंश झेल रहे भारत का बच्चा-बच्चा समझ चुका है कि ये आतंकी लातों के भूत हैं, जो बातों और सद्भावना से कभी नहीं सुधरने वाले हैं, लेकिन पता नहीं क्यों देश की सरकारें पिछली सरकारों के अनुभव से सीखने के बजाय खुद ही ठोकर खाने को इच्छुक बैठी है?

–  सचिन पौराणिक

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