संत की आत्महत्या छोड़ गई सवाल

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ओशो कहते थे, “तुम्हारे बड़े-बड़े साधु-महात्मा और जैन मुनि एकांत में जब मुझसे मिलने आते हैं तो पूछते हैं कि संन्यास लेकर कोई भूल तो नहीं कर दी? संसार को छोड़ जरूर दिया है, लेकिन यहां कुछ पाया नहीं है, हाथ आज भी खाली ही हैं। कभी-कभी लगता है कि संसारी मनुष्य ही ज्यादा खुश है, कम से कम कह तो सकता है कि हां, हम दुखी हैं। हम तो अपना दुःख भी कहीं जाहिर नहीं कर सकते।”

ओशो आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कही बातें, उनके सुनाए वृतान्त आज भी अनेक संत अपने नाम से सुनाकर अपनी दुकानदारी चला रहे हैं।

बात सही है कि हमारे कथित साधु-संत, मौलाना, पादरी आदि में से ज्यादातर हमारे जैसे ही हैं। इनकी कोई मौलिक अनुभूति नहीं है। इनके लिए संतत्व की बातें, लिबास और प्रवचन देना सिर्फ एक रोज़गार है। अपने जीवनयापन के लिए कोई काम करता है, चाय बेचता है, नौकरी करता है, वैसे ही कुछ निठल्ले, लेकिन शातिर लोग संत बनकर अपनी दुकान खोल लेते हैं।

पहले साधु-संत बनने से पहले संन्यास लेना होता था, लेकिन आजकल के संत अपने दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहते हैं इसलिए वे संत जरूर बन जाते हैं, लेकिन संसार नहीं छोड़ते बल्कि इन संतों के पास लौकिक सुख आम इंसान से कई गुना ज्यादा होता है। ये शादी भी करते हैं, बीवी की डांट सुनते हैं, बच्चे पैदा करते हैं और पारिवारिक और संपत्ति के विवादों में लगे रहते हैं, लेकिन फिर भी संत कहलाते है। अपने लिए ‘गृहस्थ संत’ एक नया नाम भी ईजाद कर लिया है इन्होंने।

कुछ दिन पहले तक हर टीवी चैनल पर ज्योतिष, धर्म और पूजन की विभिन्न विधियां सिखाने वाले और अपने आप को शनि महाराज का भक्त बताने वाले दाती महाराज पर उनकी एक शिष्या ने दुष्कर्म का आरोप लगाया। आरोप लगते ही शनि की साढ़ेसाती और महादशा से बचने के उपाय लोगों को बताने वाले दाती महाराज को खुद शनि के कोप से बचने का कोई उपाय नहीं सूझा और इसलिए महाराज पुलिस से बचने के लिए फरार हो गए। कल खबर आई कि इंदौर में रहने वाले राष्ट्रसंत भय्यू महाराज ने तनाव में आकर खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली।

जिंदगी के तनाव और अपराध बोध से ग्रस्त आम जनमानस जिन संतों के चरणों में शीश झुकाकर यह उम्मीद करता है कि उसे कोई मदद मिलेगी, आशीर्वाद मिलेगा, लेकिन वे संत खुद कितने तनाव में होते हैं, यह बात भय्यू महाराज की आत्महत्या से साफ हो गई है। क्या नहीं था भय्यू महाराज के पास? राज्यमंत्री का दर्जा, सरकारी सुरक्षा, बंगला, पैसा, शोहरत और बड़े-बड़े राजनेता उनके पैर छूते थे। दो शादियां उन्होंने की थी, लेकिन पारिवारिक सामंजस्य बनाने में वे खुद को इतना असमर्थ पा रहे थे कि इस तनाव में दुनिया को अलविदा कह देना उन्हें ज्यादा आसान विकल्प लगा।

ऐसे में सवाल है कि यदि लाखों श्रद्धालुओं को मार्गदर्शन देने वाले संत खुद ही भीतर से इतने खोखले और कायर हैं तो उनके द्वार पर सिर टेकने वाले लोगों पर क्या बीत रही होगी? क्या वे खुद को ठगा हुआ महसूस नहीं कर रहे होंगे? संत का जीवन ऐसा होना चाहिए, जो समाज को प्रेरणा दे सके, लेकिन भय्यू महाराज की आत्महत्या को कैसे न्यायसंगत और तर्कसंगत ठहराया जा सकता है? भय्यू महाराज की आत्महत्या ऐसे अनेक सवाल पीछे छोड़ गई है, जिनके जवाब ढूंढने की कोशिश पूरे समाज को मिलकर करना चाहिए।

-सचिन पौराणिक

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