‘राम’ की राह में रोड़े…

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अयोध्या का राम मंदिर एक ऐसा मुद्दा है, जो किसी भी चुनावी रण की दिशा बदलने में पूर्णतः सक्षम है। भगवान राम देश के अलावा दुनियाभर में बसने वाले करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है। राम इस भारत भूमि के प्राण हैं| राम के बिना भारत के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। भगवान राम का एक भव्य मंदिर उसी स्थान पर बने, जहां रामलला का जन्म हुआ है| यह इच्छा हर हिंदुस्तानी की है और हो भी क्यों ना? हिंदुस्तान की पावन धरा पर राम का मंदिर नहीं बनेगा तो क्या अफगानिस्तान में बनेगा?

देश के जनमानस, जिनमें आम मुस्लिम भी शामिल हैं कि भावना भी यही है कि अयोध्या में एक भव्य राम मंदिर बने और इस विवाद का शांति से निपटारा हो जाए। सियासी पार्टियां इस मसले का हल निकलने नहीं देना चाहती हैं और इस मुद्दे पर अपनी राजनीति चलती रहने देना चाहते हैं।

मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव के अंदर की कहानी यही है कि विपक्ष को डर है कि अगले आम चुनाव के पहले यदि अयोध्या मामले में मंदिर निर्माण की राह प्रशस्त करने वाला कोई फैसला आ गया तो 2019 में भाजपा का विजय रथ कोई रोक नहीं पाएगा। अपने घोषणा-पत्र में और सार्वजनिक मंचों से भी भाजपा नेता मंदिर निर्माण के लिए अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते रहते हैं। यह जानने के लिए किसी रॉकेट विज्ञान की जरूरत नहीं है कि राममंदिर यदि भाजपा के कालखंड में बन गया तो भाजपा हिंदुत्व लहर पर सवार होकर सत्ता में जोरदार वापसी करेगी। वोटों का जो एकतरफा ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में होगा, उससे विपक्ष के परखच्चे उड़ जाएंगे।

राममंदिर का मुद्दा मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की बेंच के पास ही है और वे इस केस में काफी सक्रिय एवं परिणाम केंद्रित होकर काम कर रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि देश के बहुसंख्यक समुदाय के आराध्य का मंदिर भी क्या चुनावी चश्मे से देखा जाएगा? हिंदुओं की भावना है कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण शीघ्र शुरू हो। अब इससे किस पार्टी को चुनावी फायदा मिलता है, इससे उनको कोई मतलब नहीं। चुनाव इस देश मे होते रहते हैं, सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन भगवान राम के प्रति हिंदुओं की भावना अनंत काल से चली आ रही है और चलती रहेगी।

विपक्ष ने मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ चलाए जाने वाले महाभियोग प्रस्ताव को लेकर जो 5 वजहें गिनाई हैं, वे सब बचकानी हैं। इन पांचों कारणों पर गौर किया जाए तो एक भी कारण इतना वजनदार नहीं है, जिसकी बिनाह पर मुख्य न्यायाधीश पर महाभियोग चलाया जा सके। कांग्रेस के कई बड़े नेता ये बात समझ रहे थे इसलिए वे इस मुहिम को अक्लमंदी भरा फैसला नहीं मान रहे। राहुल गांधी के पास अगर राजनीति का कुछ मौलिक अनुभव होता तो वे भी इस मुद्दे पर पैर पीछे खींच लेते, लेकिन वे अवकाशकालीन राजनीति की सोच से उबरने में नाकाम साबित हो रहे हैं।

गौरतलब है कि जो मुख्य वजह है महाभियोग लाने की उसका कहीं जिक्र नहीं किया गया है। राममंदिर का कांग्रेस सहित विपक्ष नाम भी नहीं ले रहे हैं, लेकिन कुछ समय पहले कपिल सिब्बल ने ही यह मांग की थी कि राम मंदिर पर सुनवाई 2019 तक टाल दी जाए। “पर्दे के पीछे का खेल” इसे ही कहते हैं। इस महाभियोग प्रस्ताव को उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने खारिज कर दिया है, लेकिन सवाल यह है कि यदि वे उस प्रस्ताव की मंजूरी दे भी देते तो संख्याबल के अभाव में यह प्रस्ताव गिरना तय था। लगातार इस मामले पर जिस तरह कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जो जजों पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की प्रक्रिया थी, उससे सुप्रीम कोर्ट की इज्जत में कमी हुई है।

अब कांग्रेस उपराष्ट्रपति के फैसले के खिलाफ चाहे सुप्रीम कोर्ट जाए चाहे अंतरराष्ट्रीय कोर्ट, लेकिन उनकी इस मुद्दे पर किरकिरी हो चुकी है। लोकतंत्र के सबसे भरोसेमंद स्तम्भ पर जिस तरह उंगली उठाई जा रही है, वह शुभ संकेत नहीं है। यदि इस दबाव के कारण राममंदिर का मुद्दा फिर टलता है तो देश की बहुसंख्यक आबादी यह देख रही है और  समझ रही है कि कौन उनके आराध्य के मंदिर निर्माण में रोड़े डाल रहा है और इसका जवाब 2019 में अपने वोट से देना जनता का हक है।

-सचिन पौराणिक 

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