Talented View : फिर चुनाव के समय याद आने लगे राम

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अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में बनी एनडीए सरकार ने विकास के बेहतरीन कार्य किये थे, लेकिन राम मन्दिर के मुद्दे पर वो एक कदम भी आगे नही बढ़ सके] क्योंकि गठबंधन के बाकी दलों का दबाव उन पर था। जनता भी ये बात समझ रही थी कि राम का मंदिर बनाने की नीयत भाजपा की जरूर है लेकिन संसद में पर्याप्त संख्या नही होने की वजह से कुछ नही कर पा रहे हैं। अगले आम चुनाव में विकास के तमाम कार्यों के बाद भी जनता ने भाजपा और वाजपेयी साहब को हरा दिया था।   उसके बाद लगातार 10 वर्षों के कांग्रेस शासन के बाद 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा ने एक तरफा जीत से रिकॉर्ड बना दिया। जनता को लगा इस बार तो मंदिर बन ही जाएगा, लेकिन अब जबकि भाजपा की पूर्ण बहुमत की 56 इंची सरकार का कार्यकाल भी लगभग पूर्ण हो चुका है और कुछ महीनों बाद देश मे आमचुनाव होने हैं तब एक बार फिर अयोध्या सुर्खियों में आ गयी है।

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इस बार सरकार ने अयोध्या की गैर-विवादित ज़मीन को उसके मूल मालिकों को लौटाने की बात कही है। सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में इस उद्देश्य से एक याचिका दाखिल की गयी है। सरकार के याचिका दाखिल करने के बाद से ही राम के नाम पर राजनीति तेज़ हो गयी है।  गौरतलब है कि देश के सुप्रीम कोर्ट ने राम मन्दिर मामले पर अभी तक कोई ठोस फैसला नहीं दिया है। अभी जो बेंच राममन्दिर की सुनवाई कर रही है उनका उद्देश्य भी इस मामले को लटकाने का ही दिखाई देता है। कोर्ट बिना कोई सबूत जांचे हर बार अगली तारीख दे रही है और इधर जनता की सब्र का बांध टूटने लगा है। दुनियाभर में बसने वाले करोड़ो हिंदुओ की आस्था के केंद्र भगवान श्रीराम के साथ कोर्ट का ऐसा सलूक निंदनीय भी है और बर्दाश्त करने लायक भी नही है।

खेर, राम मन्दिर बनाने का वादा न कांग्रेस का था न विपक्ष का और न कोर्ट का। ये वादा उस पार्टी का था जिस पार्टी के मूल सिद्धांतो में ही श्री राम है, लेकिन दुख इस बात का है कि इस पार्टी ने भी मंदिर के नाम पर हिंदुओं की भावनाओं का शोषण ही किया है। ये 56 इंच की सरकार बिना सुप्रीम कोर्ट या विपक्ष से पूछे सर्जिकल स्ट्राइक कर सकती है, आधी रात को नोटबंदी कर सकती है लेकिन राममन्दिर निर्माण के नाम पर इन्हें विपक्ष, कोर्ट, राज्यसभा और संविधान सब याद आ जाता है।

अब जबकि चुनाव करीब आ गए है और पार्टी कार्यकर्ताओं का फीडबैक उच्च स्तर तक पहुंचना शुरू हो गया है कि जनता में राममन्दिर के लिये भारी रोष है तो इन्हें जनता को ये दिखाना पड़ रहा है कि वे मंदिर निर्माण के लिये प्रतिबद्ध हैं।  वाजपेयी सरकार की हार से शायद इतना सबक तो भाजपा को सीख ही चुकी है कि इस देश में विकास के नाम पर चुनाव नही जीते जाते और ये कवायद सिर्फ इसीलिए की जा रही है कि  चुनाव करीब है और जनता गुस्सा है।

हिंदुओं के लिये ये शर्म की बात है कि उनके आराध्य महज एक चुनावी मुद्दा बनकर रह गए हैं। सवाल सरकार से यही है कि अचानक ये गैर-विवादित जमीन उन्हें चुनाव से ठीक पहले क्यों याद आयी? जब सरकार के पास सर्वाधिक अनुकूल परिस्थियां थी तब ये काम क्यों शुरू नही किया गया? क्या जनता को राम के नाम से एक बार फिर ठगने की पटकथा लिखी जा रही है?  कांग्रेस राममंदिर की राह में रोड़े अटका रही है ये जनता जानती है लेकिन उनका चुनावी मुद्दा ये था ही नहीं। अगर भाजपा मंदिर निर्माण के नाम पर राजनीति कर सकती है तो कांग्रेस भी सेक्युलरिज़्म के नाम पर राजनीति कर ही सकती है। अपने घोषणापत्र में अयोध्या का जिक्र जिस पार्टी ने किया है सवाल तो उनसे ही पूछे जाएंगे कि पूर्ण बहुमत की सरकार में भी मंदिर आखिर क्यों नही बना? इस नाकामी का ठीकरा विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट पर फोड़ने से भी कुछ नहीं होने वाला। वक्त राममन्दिर पर अब तक किये गए कार्यों का हिसाब देने का है ना कि  नए वादे करके दोबारा गुमराह करने का। अब मंदिर निर्माण से कम किसी भी बात पर लगता नहीं कि जनता सरकार का साथ देगी।

– सचिन पौराणिक 

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