न्यूज़ चैनल पर दी पत्रकार को गालियां…

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एक संत से किसी श्रद्धालु ने पूछा कि समझदार और मूर्ख में क्या अंतर होता है? संत ने जवाब दिया- समझदार अपनी बात से पलट सकता है, जबकि मूर्ख उसी बात को पकड़कर बैठा रहता है। संत ने आगे समझाते हुए कहा कि मैं साधकों से हमेशा कहता हूं कि स्त्री की तरफ नहीं देखना और छूना भी नहीं, लेकिन इस बात के कई मायने हैं। कल को कोई स्त्री नदी में डूब रही है तो समझदार शिष्य मेरी बातों को भुलाकर उसकी जान बचा लेगा, लेकिन मूर्ख शिष्य तब भी मेरे वचनों को ही पकड़कर बैठा रहेगा कि स्त्री को छूना नहीं।

कुछ दिन पहले ही चर्चा हुई थी कि टीवी बहस में कांग्रेस के प्रवक्ता सबसे ‘निरीह प्राणी’ नज़र आते हैं। भाजपा, संघ, राजनीतिक विश्लेषक के अलावा एंकर भी उनको ही घेरने में लगे रहते हैं। चर्चा का सार यही था कि ऐसे विपरीत माहौल में कांग्रेस के प्रवक्ताओं को बेहद चतुराई और समझदारी से अपनी बात कहनी पड़ेगी, तभी वे जनता तक अपनी बात पहुंचा पाएंगे, लेकिन कांग्रेस के पास एक प्रवक्ता ऐसा नहीं है, जो ऐसा कर सके।

कल एक निजी चैनल में हो रही बहस के दौरान कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी ने न्यूज़ एंकर को गालियां देकर अपनी भड़ास निकाली। न्यूज़ एंकर ने उन्हें माफी मांगने और अपने शब्द वापस लेने के लिए

कहा तो त्यागी ने साफ इनकार करते हुए कई बार वही आपत्तिजनक शब्द दोहरा दिए। एंकर माफी मंगवाने पर अड़ा रहा और त्यागी अपने शब्दों पर, लेकिन इन सबके बीच सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा तार-तार हो गई।

कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी बेहद नौटंकीबाज हैं। इसके पहले भी वे एक अन्य चैनल पर बोलने का समय न देने का इल्जाम लगाकर मुंह पर पट्टी बांधकर बैठ गए थे। न्यूज़ एंकरों से उनकी कई बार तीखी बहस हो चुकी है, लेकिन जिस तरह कल उन्होंने लाइव टीवी पर आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया, उससे सभी हैरान रह गए। एंकर ने त्यागी से सवाल किया था कि कांग्रेस अलवर के रकबर का मुद्दा तो संसद में उठाती है, लेकिन बाड़मेर के खेताराम को क्यों भूल जाती है? एंकर का यह सवाल बिल्कुल वाज़िब था क्योंकि देश भी यह जानना चाहता है कि आखिर किसी हिन्दू की मॉब लिंचिंग होने पर कांग्रेस को क्या सांप सूंघ जाता है? जिस तरह राहुल गांधी ने कहा था कि कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है तो क्या यह मान लिया जाए कि कांग्रेस का दिल सिर्फ मुस्लिमों के लिए ही धड़कता है?

एंकर का यह सवाल तीखा जरूर था, उग्रता से भरा भी था, लेकिन किसी राष्ट्रीय पार्टी के प्रवक्ता ने ऐसी हल्की भाषा आखिर क्यों इस्तेमाल की? एंकर जानबूझकर बहस को उत्तेजना से भरा रखना चाहते हैं, यह बात सच है। ऐसा करने के पीछे उनकी मजबूरी है क्योंकि टीआरपी का खेल सबको पता है। एंकर सिर्फ अपना काम कर रहा था। उन्हें हक है सवाल पूछने का और प्रवक्ता की जिम्मेदारी होती है सवालों के जवाब देने की। एंकर को हक़ है तीखे और उलझे हुए सवाल पूछने की, लेकिन प्रवक्ताओं का काम होता है कि चतुराई से उन प्रश्नों का जवाब दे। प्रवक्ता का हक है यह तय करने का कि वह किन सवालों का जवाब दे, लेकिन भाषाई सभ्यता भुला देना कतई जायज़ नहीं।

यदि किसी कांग्रेस प्रवक्ता को बहस के विषय से आपत्ति है तो ऐसी बहस में भाग लेना ही नहीं चाहिए, लेकिन भाषाई हल्केपन पर उतर आना देश की सबसे पुरानी पार्टी के प्रवक्ता को शोभा नहीं देता। यहां गौर करने वाली बात है कि एंकर ने अपना काम बखूबी किया औऱ भाषा की शालीनता भी नहीं छोड़ी, लेकिन राजीव त्यागी ने अपने बड़बोलेपन से खुद की और पार्टी की भद् पिटवा ली।

एंकर और बाकी पेनलिस्ट द्वारा जब त्यागी को माफी मांगने को कहा गया तो वे अपने शब्दों को वैसे ही पकड़कर बैठ गए, जैसे कुछ मूर्ख शिष्य अपने गुरु की बातों को पकड़कर बैठ जाते हैं। गलतियां इंसान से ही होती हैं और टीवी बहस की गर्मागर्मी में हो सकता है राजीव त्यागी की भी जुबान फिसल गई हो, लेकिन अपने शब्दों पर अड़े रहना उनका बालहठ, बचकानापन और बदनीयती दर्शाती है।

अपनी गलत बातों पर भी टिके रहना समझदार का लक्षण नहीं है। सवालों के जवाब में एंकर को गाली देना सिर्फ कांग्रेस प्रवक्ता के मानसिक दिवालियेपन को जनता तक पहुंचा रहा है। कांग्रेस के इस रवैये पर देश हैरान और आशंकित है कि विपक्ष में रहते हुए जब कांग्रेस प्रवक्ता पत्रकारों को गालियां दे रहे हैं तो सत्ता पाने के बाद ये कहीं इंदिरा गांधी की तरह फिर से आपातकाल लगाकर पत्रकारों को जेल में तो नहीं डाल देंगे?

-सचिन पौराणिक

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