दुष्कर्मियों को सार्वजनिक रूप से कठोर सज़ा दें

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फिर एक बलात्कार, फिर एक छोटी सी बच्ची किसी की हैवानियत की शिकार, फिर कैंडल मार्च, फिर विरोध प्रदर्शन, फिर सख्त कानून की मांग, फिर बलात्कारी को फांसी देने के लिए प्रदर्शन|  इसके कुछ दिन बाद हम फिर अपने कामों में लग जाएंगे और सारी तख्तियां बक्सों में बंद करके रख देंगे| अगली बार जब फिर कोई मासूम इस तरह की दरिंदगी का शिकार बनेगी, तब हम फिर तंद्रा से जागेंगे और यही प्रक्रिया फिर दोहराएंगे। सरकारें भी समझने लगी है कि हम नेताओं की ही तरह यह जनता भी कम नौटंकी नहीं है इसलिए वे भी ध्यान नहीं देते क्योंकि पता है ये सब सिर्फ 4 दिन की ड्रामेबाज़ी से ज्यादा कुछ नहीं है।

अफ़ीम की खेती के लिए देशभर में मशहूर मंदसौर ज़िला पिछले साल हुए किसान आंदोलन के कारण देशभर में सुर्खियां बना। किसानों के खून से मंदसौर की धरती लाल हुई और अब लगभग 1 साल बाद एक बार फिर ग़लत वजह से यह शहर देशभर में चर्चा में आ चुका है। शिवना नदी के किनारे बसी भगवान पशुपतिनाथ की पावन धरती पर एक 7 साल की मासूम एक हैवान के हत्थे चढ़ गई। उस हैवान ने न सिर्फ उसके साथ दुष्कर्म किया बल्कि उसे मार डालने की भी कोशिश की। बच्ची के शरीर के नाजुक हिस्सों को नुकसान पहुंचाकर मार डालने के लिए उस दरिंदे ने कुछ ठोस वस्तु से बच्ची पर कई वार किए। दरिंदगी की हद तब हो गई, जब इससे बच्ची की आंतें तक बाहर आ गईं। यह हैवानियत वैसी ही थी, जैसी कुछ साल पहले दिल्ली के निर्भया केस में हुई थी, लेकिन यहां पीड़िता खुशकिस्मत रही क्योंकि उसकी जान बच गई। डॉक्टरों की एक टीम ने 2 घंटों में 3 सर्जरी करके मासूम के प्राण बचा लिए।

इस घटना के बाद आरोपी इरफ़ान उर्फ़ भय्यू के खिलाफ अंचल के लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। मंदसौर, नीमच, नारायणगढ़, पिपलियामंडी, जावरा और रतलाम में आरोपी को फांसी की सज़ा देने के लिए तमाम नागरिकों और संगठनों ने विरोध के सुर प्रबल किए। असली सवाल यही है कि क्या इन सबसे बलात्कार रुक जाएंगे? आखिर ऐसे जघन्य अपराधों की जड़ कहां है? क्यों नहीं हम समस्या की जड़ पर प्रहार करने के बजाय समस्या के पेड़ के पत्ते ही तोड़ते रहेंगे? इस समस्या का जवाब छिपा है लोगों की मनोवृत्ति में। जब तक ऐसे बलात्कारी अपराधियों को शीघ्रता के साथ और जनता के सामने सज़ा देना शुरू नहीं की जाती, तब तक अपराधियों के मन में खौफ पैदा नहीं होने वाला है।

देशभर के अलग-अलग हिस्सों में मासूमों के अपराधियों को सरेआम फांसी पर लटकाया जाए या कुछ ऐसी सज़ा उन्हें दी जाए, जैसे उन्हें जिंदगीभर के लिए नपुंसक बना दिया जाए| तब ऐसा माहौल बनेगा, जिससे ऐसा कोई घृणित कार्य करने से पहले हर दरिंदे की रूह कांप उठेगी और तब जाकर बच्चियों के लिए यह देश सुरक्षित बन सकेगा। ऐसा करने से यदि संविधान रोक रहा है तो इस संविधान को बदल दिया जाना चाहिए। देश के नागरिकों और मासूमों की हिफ़ाज़त के लिए ही संविधान है, संविधान के लिए ये सब नहीं हैं| यह बात सभी को समझ में आ जाना चाहिए। हर काम को संविधान का हवाला देकर टालना सरकारों की चाल है, जिसमें जनता को अब नहीं फंसना चाहिए। मासूम बच्चियों में जिसे हवस दिखाई पड़ जाए, उस दरिंदे को आगे जीने का कोई हक नही होना चाहिए। हमें यह समझना होगा कि दुष्कर्मियों को जब तक सार्वजनिक रूप से कठोर सज़ा नहीं दी जाएगी परिस्थितियां नहीं बदलने वाली है, चाहे हम कितनी ही मोमबत्तियां फूंक दें।

-सचिन पौराणिक 

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