जनहित या ‘स्वहित’?

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एक अंग्रेज जज ने अपनी किताब में लिखा था कि भारत में न्यायाधीश रहने के दौरान मेरे अनुभव सबसे विचित्र रहे। ऐसा कई बार हुआ, जब गुनहगार खुद चलकर सामने आया और बोला कि मैंने फलां की हत्या कर दी है, इसकी जो भी सजा है मुझे दे दीजिए। जिस केस में न कोई शिकायत है न कोई गवाह, लेकिन अपराधी खुद अपना जुर्म कबूल कर ले, ऐसा आज के जमाने में संभव ही नहीं है। आज तो ऐसे हालात हैं कि जिसे न्याय चाहिए, उसे कोई पूछ भी नहीं रहा और जिनको नहीं चाहिए, उनको जबर्दस्ती न्याय देने की कोशिश की जा रही है।

जस्टिस लोया की मौत के मामले में एसआईटी जांच को लेकर दायर की गई जनहित याचिका को कल सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दिया और कहा कि उनकी मौत पूरी तरह प्राकृतिक थी, जिसमें आगे किसी जांच की जरूरत नहीं है। गौरतलब है कि लोया के बेटे ने पहले ही यह बात कह दी थी कि उनके पिता की मौत पर उन्हें कोई शक नहीं है और किसी भी साजिश की आशंका से उन्होंने इनकार किया था। उसके बाद भी जिस तरह से जनहित याचिका लगाई गई, वह सवालों के घेरे में थी।

जिस तरह गुलाबजामुन में न गुलाब होता है न ही जामुन, वैसे ही आजकल लगाई जाने वाली जनहित याचिकाओं में जनता का हित दूर-दूर तक नज़र नहीं आता। जैसे गरीबों की बात करते करते नेता जाने कैसे अमीर बन जाते हैं, कैसे जनता के टैक्स के पैसों से पढ़ने वाले हार्दिक पटेल जैसे तथाकथित अधेड़ उम्र के छात्र अब हवाई सफर कर रहे हैं और महंगे फोन इस्तेमाल कर रहे हैं, वैसे ही जनता यह कभी समझ नहीं पाती कि जिस सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई की वकील लाखों रुपए फ़ीस लेते हैं, वहां इन जनहित याचिका लगाने वालों का भारी खर्च कौन उठाता है? हर गैर जरूरी मुद्दों पर जनहित याचिका लगाने वालों के पीछे कौन सा गिरोह काम कर रहा है? क्या राजनीतिक रंजिश निकालने के लिए भी जनहित याचिका का सहारा लिया जाता है? यह तो बच्चा भी समझ रहा है कि इस जनहित याचिका वाले गिरोह को जस्टिस लोया की मौत और इंसाफ से कोई वास्ता नहीं था बल्कि ये लोग कैसे भी करके अमित शाह को घेरना चाह रहे थे।

यदि जनहित याचिका लगानी ही है तो जेल में बंद हजारों निर्दोष कैदियों के लिए कोई याचिका क्यों नहीं लगाता है? कितने ही गरीब सिर्फ इसलिए जेलों में सड़ने को मजबूर है क्योंकि जमानत के चंद रुपए देने वाला कोई उनके पास नहीं है, उनकी फिक्र नहीं करना चाहिए जनहित वालों को? न्याय की कछुए जैसी चाल को तेज करने के लिए नहीं लगानी चाहिए कोई जनहित याचिका? सबूतों की कमी, जांच में गलतियां, जांच अधिकारियों की लापरवाही जैसी अनेक वजहों से कितने ही बेकसूर जेलों में बंद है और असली आरोपी आजाद हैं, उनके लिए कोई जनहित याचिका क्यों नहीं लगाता है? आज के दौर में कोई गरीब न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच ही नहीं सकता है| इन गरीबों की बात करने के लिए कोई स्पांसर नहीं मिलता क्या? जनता जानना चाहती है कि इन जनहित याचिका लगाने वालों को फंडिंग कौन करता है? कौन यह तय करता है कि किस मुद्दे पर जनहित याचिका लगानी है और किस मुद्दे पर शुतुरमुर्ग की तरह अपना सिर धरती में घुसा लेना है?

सुप्रीम कोर्ट ने कठोर शब्दों में इस गिरोह की निंदा की और कहा कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वता को लोकतांत्रिक तरीकों से ही निपटाया जाए और कोर्ट को ऐसे मामलों के लिए जंग का अखाड़ा नहीं बनाया जाए। कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानने वाले प्रशांत भूषण जैसे वकील इससे तिलमिला उठे हैं और इसे न्याय प्रणाली का ‘काला दिन’ बता रहे हैं, लेकिन जहां लाखों केस आम आदमी के लटके पड़े हैं, वहां जनहित याचिका लगाने वालों की पूरी जांच की जाना चाहिए कि हर याचिकाकर्ता के पीछे कौन सी ताकतें खड़ी हैं? क्योंकि इन बेवजह की याचिकाओं से जनता का कोई हित नहीं हो रहा है बल्कि जनता के मामलों का वक्त भी इनमें ज़ाया हो रहा है।

ऐसी फालतू याचिकाओं की बढ़ती तादाद को देखते हुए कुछ कठोर कानून बनाने की जरूरत है, जिससे हर कोई मुंह उठाकर सुप्रीम कोर्ट में कोई निजी स्वार्थ से प्रेरित याचिका को जनता के हित का नाम लेकर न चला आए। ऐसा नहीं होता है तो ‘जनहित याचिका’ को नया नाम ‘स्वहित याचिका’ देना पड़ जाएगा।

-सचिन पौराणिक  

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