उद्योगपतियों का हित भी सोचिए मोदीजी

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Public And Private Enterprises Cannot Cut Salaries Or Fire Workers During Lockdown:

प्रधानमंत्री मोदी का बहुप्रतीक्षित संबोधन आज सम्पन्न हुआ। उम्मीदों के मुताबिक देश मे जारी लोकडाउन को 3 मई तक बढ़ा दिया गया है। प्रधानमंत्री के इस उद्बोधन में सरकार के अच्छे कार्यो पर मुहर भी थी और भविष्य के लिए व्यापक योजना भी। प्रधानमंत्री का ‘दीनबंधु’ अवतार भी इस उद्बोधन में नज़र आया जब उन्होंने अपने यहां काम करने वालों को नौकरी से न निकालने की बात कही।

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प्रधानमंत्री ने बुजुर्गों का ध्यान रखने को कहा, घरों में रहने पर जोर दिया, मास्क लगाए रखने की बात कही और उद्योगों को कर्मचारियों को नौकरी से निकालने का अनुरोध भी किया। कुलमिलाकर प्रधानमंत्री के उद्बोधन में लॉकडाउन को आगे बढ़ाने के अलावा कुछ काम की बात नही थी। प्रधानमंत्री ने न देश मे कोरोना फैला रहे वर्गविशेष पर कुछ कहा और न ही स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिस पर हो रहे हमलों पर एक शब्द अपने मुख से निकाला।

प्रधानमंत्री लोक-लुभावन बातें करने में आजकल कुछ ज्यादा उत्सुक रहने लगे है। कर्मचारियों को नौकरी से न निकालने की बात भी कोरी बकवास ही है। मोदी सरकार उद्योगपति, व्यापारियों को आखिर समझती क्या है? उनके पास क्या कुबेर का खजाना है जो कभी खत्म नही होगा? भारत सरकार अपने कर्मचारियों को नही निकालेगी क्यूकी उनकी तनख्वाह सरकार नही जनता देती है। लेकिन व्यापारी, पूंजीपतियों की अपनी हजार समस्याएं है(Salary In Lockdown)

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अगर कोई कर्मचारी मुनाफा कमाकर नही दे पा रहा तो उसे कब तक मुफ्त की सेलेरी दी जाएगी? और उद्योगपति ऐसा करे भी तो उसको सरकार क्या सहूलियत देने को तैयार है? उसका जीएसटी मीटर चालू है, किराया चालू है, बिजली का बिल चालू है, तनख्वाह चालू है लेकिन इनकम बिल्कुल बन्द है? तो वो क्या करे? उद्योगपति देश की रीढ़ है लेकिन मुफ्त सेलेरी बांटने का कहकर उस रीढ़ को भला क्यों तोड़ा जा रहा है? हर उद्योगपति अम्बानी नही है और न ही उसके पास कुबेर का खजाना है।

प्प्रधानमंत्री कुछ उद्योगपतियों के करीब रहतें है शायद इसीलिए वो हर उद्योगपति को अम्बानी-अडानी ही समझने लगे है। लेकिन मोदीजी ऐसा है नही। बात सिर्फ इतनी है कि उद्योगपति देश की आबादी का 1% भी नही है जबकि कर्मचारियों की संख्या बहुत अधिक है। उन्हें घर बैठे तनख्वाह देने की बात सिर्फ चुनावी एजेंडे के तहत की जा रही है। क्योंकि ऐसा करना देश के 90% उद्योगपतियों के लिए व्यवहारिक नही है। ऐसे सुझावों को देखकर लगता है कि मोदीजी के “दीनबंधु” बनने के चक्कर मे उद्योपतियों की हालत कटोरा लेकर खड़े होने जैसी हो जायेगी(Public And Private Enterprises Salary In Lockdown)

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कोरोना से जंग हम सब मिलकर लड़े वो सही है। लेकिन एक वर्ग के ऊपर सारा भार डालकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग नही सकती। पहले तो उद्योग विरोधी नीतियों से सरकार ने उद्योगों का बंटाधार कर दिया और अब उन्हें मुफ्त की तनख्वाह बांटने का कहकर क्या सरकार उद्योगों का जड़-मूल से विनाश करना चाहती है? मोदीजी आपको गरीबो की चिंता है, वो होना भी चाहिए। लेकिन ये मत भूलिए की सरकार से ज्यादा रोजगारों का सृजन ये उद्योगपति ही करतें है। इसलिए ऐसे नाजुक वक्त में उद्योगों को नही सम्हाला गया तो देश मे बेरोजगारी की ऐसी आंधी आएगी जिसे कोई सरकार नही रोक पायेगी।

-Sachin Pauranik

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