Talented View : प्रदर्शनकारी कर रहे सरकार के आदेश की अवहेलना

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कोरोना के खौफ (Coronavirus Havoc)  के चलते हमारा देश भारत भी परेशानियों से घिर चुका है। सभी जानतें है कि कोरोना एक बार देश मे फैला तो उसे रोकने बहुत मुश्किल हो जाएगा। (Shaheen Bagh Protest Continues)  इसीलिए देश की समझदार जनता सरकार के साथ पूरा सहयोग कर रही है और बचाव के हरसंभव रास्ते अपना रही है। लेकिन दुख इस बात का है कि एक वर्ग देश मे ऐसा भी है जो इस संकट की घड़ी में भी व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर नही उठ पा रहा है।

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ये वर्ग है शाहीन बाग़ (Shaheen Bagh Protest Continues)  के प्रदर्शकारी और उनके समर्थकों का। दिल्ली में सड़क जाम करके बैठे ये लोग अपनी जिद छोड़ने को तैयार नही हो रहे है। दिल्ली में जबकि स्कूल-कॉलेज बंद है, सिनेमाघर बंद है, सभी दर्शनीय स्थल बंद कर दिए है और दिल्ली सरकार ने ये आदेश जारी कर रखा है कि 50 से ज्यादा लोग किसी सार्वजनिक स्थान पर एकत्रित न हो। तब भी ये लोग शाहीन बाग़ में भीड़ इकठ्ठा करके बैठे हुए है और हटने को तैयार नही हो रहे है।

राष्ट्रीय आपदा के समय देश का साथ देने की बजाय ये लोग अपनी ही नौटंकी में लगे हुए है। आश्चर्य इस बात की भी है कि 2 लट्ठ लगाकर सड़क खाली कराने की बजाय पुलिस के अधिकारी इन्हें समझाने जातें है और ये लोग तब भी नही मान रहे है। अगर कल को इस भीड़ में किसी को कोरोना हो गया और संक्रमण फैल गया तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है? ये लोग मूर्ख या गंवार हो सकतें है लेकिन इनकी ज़िद के आगे पूरे देश के स्वास्थ्य को दांव पर नही लगाया जा सकता।

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पहले ऐसा कश्मीर में होता था कि धारा 370 की वजह से भारत का कानून वहां लागू नही होता था। लेकिन अब देश की राजधानी में ही एक कश्मीर बना दिया गया है। दिल्ली सरकार के फैसले शाहीन बाग़ (Shaheen Bagh Protest Continues)  में लागू क्यों नही किये जा रहे है? शाहीन बाग़ दिल्ली का कश्मीर आखिर क्यों बनने दिया जा रहा है? शाहीन बाग़ जाकर अपनी राजनीति चमकाने वाले नेता इन्हें समझा क्यों नही रहे है? और ग्रह मंत्रालय भी इन्हें बर्दाश्त क्यों कर रहा है? धरती को चपटी मानने वालों को विनय और विज्ञान की बात समझ आएगी इसमें शक है, लेकिन डंडों की भाषा ये तुरन्त समझेंगे। दिल्ली पुलिस इन्हें इसी भाषा मे क्यों नही समझा रही है?

सवाल शाहीन बाग़ आंदोलन के हर समर्थक से भी है। उनके लिए अपना आंदोलन (Delhi Protest) जरूरी है या जनता की जान? एक बार कोरोना का कहर थोड़ा थम जाए उसके बाद शाहीन बाग़ में फिर तंबू लगा लेना, किसी ने रोका थोड़ी है। लेकिन अपने आप को देश के कानून से ऊपर क्यों समझा जा रहा है? आपदा की घड़ी में आपको देश के साथ खड़े होना चाहिए या देश के खिलाफ? ऐसा अड़ियल, देशविरोधी रवैया अपनाकर आप देश के बहुसंख्यक वर्ग के साथ ही हर देशभक्त की भी संवेदनायें नही खो रहे है? हर मामले में आपका स्टैंड देश के खिलाफ होता है और फिर आप पूछतें हैं हम पर शक क्यों किया जाता है?

केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार (Shaheen Bagh Protest Continues) , पुलिस और गृह मंत्रालय से हर भारतीय का निवेदन है कि शाहीन बाग़ के इस ड्रामे को अब सख्ती से कुचला जाए। क्योंकि कोरोना अगर फैलता है तो इससे लाखों की जान जा सकती है। मुट्ठीभर गंवारों के चलते देश की करोड़ों जनता को मुश्किल में नही डाला जा सकता। मानस के सुंदरकांड में तुलसीदास जी ने लिखा है “भय बिनु होई न प्रीत” मतलब बिना डर के प्रीति होती नही। इन लोगों के मन में राजदंड का भय पैदा करना बहुत जरूरी हो गया है।

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Sachin Pauranik

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