अब सेना से ही बची है उम्मीद

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इस्लाम में सबसे पवित्र महीना रमज़ान का माना जाता है। उसमें भी जुम्मा अर्थात शुक्रवार विशेष रूप से पवित्र समझा जाता है। रमज़ान के पूरे महीने मुसलमान रोज़े रखकर इबादत में व्यस्त रहते हैं। पूरे महीने की इबादत के बाद जैसे ही चांद नज़र आता है, तब ईद का त्यौहार मनाया जाता है।

वैसे भारत सरकार धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर चलती है, लेकिन रमज़ान के महीने में एक विशेष वर्ग को खुश करने के लिए अथवा गंगा-जमुनी संस्कृति की थोथी बातों में आकर कश्मीर में सफलतापूर्वक चल रहे सेना के “ऑपरेशन ऑलआउट” को सरकार ने स्थगित कर दिया। एकतरफा संघर्षविराम के इस नाजायज़ फैसले की कलई खुलने में जरा देर नहीं लगी और आतंकवादियों, पत्थरबाज़ों और पाकिस्तान तीनों ने मिलकर देश के सुरक्षाबलों के साथ कश्मीर की अवाम का भी जीना दुश्वार कर दिया।

कल रमज़ान के जुम्मे के दिन आतंकवादियों ने फिर खूनी खेल खेलते हुए आतंक की दो जघन्य घटनाओं को अंजाम दे दिया। पहली घटना में राइजिंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी की उनके दफ्तर के पास आतंकवादियों ने हत्या कर दी और दूसरे में सेना के अपहृत जवान औरंगज़ेब की अपहरण के बाद हत्या कर दी गई। इससे पहले पाकिस्तान की गोलीबारी में बीएसएफ के 4 जवान शहीद हो गए थे और कश्मीरी पत्थरबाज़ों द्वारा सुरक्षा बलों पर पथराव की वारदातों में भी बेतहाशा वृद्धि दर्ज की गई है।

दक्षिण कश्मीर के पुलवामा, अनंतनाग, शोपियां और कुलगाम क्षेत्रों में परिस्थितियां बद से बदतर हो चली है। यहां हालात इतने विकट हो गए हैं कि अब आतंकवादी आम जनता और पत्रकारों को भी निशाना बनाने से नहीं चूक रहे हैं। शुजात की हत्या क्यों हुई, यह बात समझ से परे है क्योंकि वे मुस्लिम भी थे और धारा 370 और अफस्पा के विरोधी भी, लेकिन रमज़ान के महीने में आतंकियों ने औरंगज़ेब और शुजात की हत्या करके यह दिखा दिया है उनके मददगारों को कि वे किसी के सगे नहीं हैं। वक्त आने पर वे किसी की भी हत्या करने में हिचकेंगे नहीं।

इन सबके बीच असली सवाल सरकारों से है कि आखिर क्यों मजहबी भावनाओं के नाम पर धर्मनिरपेक्ष देश में एकतरफा संघर्षविराम किया जा रहा है? रमज़ान में खूनखराबे से जब आतंकी, पाकिस्तान और पत्थरबाजों को कोई दिक्कत नहीं है तो सुरक्षाबलों पर पहली गोली न चलाने की बंदिश क्यों? सरकार का ऐसा लाचार रवैया वोटबैंक की राजनीति है या बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना जैसी परिस्थिति यह जनता समझ नहीं पा रही है। जब सेना आतंकवादियों को ठोक रही थी तो अचानक संघर्षविराम का जिन्न कहां से बाहर निकल आया?

सोचने लायक बात है कि जब देश के गृहमंत्री कश्मीर जाकर पत्थरबाज़ों को भटके हुए नौजवान बताकर उनको जेल से रिहा करवा आते हैं तो इससे सुरक्षाबलों के मनोबल पर क्या प्रभाव पड़ता होगा? रमज़ान के महीने में शहीद हुए देश के जवानों और बेगुनाह नागरिकों के खून का इल्जाम किस पर लगाना चाहिए? आतंकवादियों के मंसूबे साफ हैं, उन्हें जिहाद करना है चाहे कोई भी महीना हो, लेकिन हमारी सरकार को सैनिकों के खून की कोई कद्र ही नहीं। ये देश लोकतंत्र बहुत भुगत चुका अब कुछ साल सैन्य शासन को भी मौका देना चाहिए। देश को उम्मीद अब सेना से ही बची है |

 

-सचिन पौराणिक

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