कोई भी मुद्दे पर चिंतन करने को तैयार नहीं

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देश के विभाजन को लेकर कुछ सवाल हम सभी के मन में आ ही जाते हैं। मसलन, हमसे अलग होकर सिर्फ मजहब की बुनियाद पर पाकिस्तान बना है तो फिर हिंदुस्तान किसके लिए है? यदि जिन्ना ने मजहब के नाम पर पाकिस्तान बना लिया तो हम क्यों इस मामले में पीछे रह गए? मुस्लिमों के लिए यदि पाकिस्तान है तो हिंदुओं के लिए हिंदुस्तान क्यों नहीं ? देश के बंटवारे के मूल में ही मजहब है तो फिर सभी मुस्लिम पाकिस्तान और सभी हिन्दू हिंदुस्तान क्यों नहीं बुलवा लिए गए? ये कैसा बंटवारा था, जिससे ज़मीन के टुकड़े तो हो गए, लेकिन मकसद पूरा नहीं हुआ? सवाल बिल्कुल वाज़िब है क्योंकि पाकिस्तान में मुस्लिमों की आबादी ने बाकी सभी धर्मों को लील लिया जबकि भारत में इनकी आबादी बेतहाशा बढ़ी है।

मुस्लिमों के लिए मजहब के नाम पर 50 से ज्यादा छोटे-बड़े देश हैं, लेकिन हिंदुओं के पास क्या है? यदि कोई दुनिया से सताया हुआ हिन्दू, बौद्ध या सिख भारत आना चाहे तो उसके लिए कोई विशेष सुविधा क्यों नहीं होना चाहिए? भारत धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत पर जब रोहिंग्या जैसे अवैध घुसपैठियों और बांग्लादेशी नागरिकों को यहां रहने की अनुमति दे सकता है तो हिंदुओं को क्यों नहीं? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जिनके उत्तर कभी नहीं मिलते। इससे उलट इन प्रश्नों को खड़ा करने वालों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

ये प्रश्न पूछे जाने पर प्रश्नकर्ता को ऐसे दिखाया जाता है, जैसे उसने कोई राष्ट्रद्रोह का कार्य कर दिया हो। देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे का हवाला देकर उस पर सवालों की बौछार कर दी जाती है। अपने आप को बुद्धिजीवी समझने वाले लोग ऐसे बयान को देश के लिए खतरा बताते हैं और बयान देने वाले पर दबाव बनाते हैं। मीडिया भी उन्हें एक अपराधी की तरह पेश करता है। बिना उसका पक्ष समझे, बिना उनका परिप्रेक्ष्य जाने, उस पर एकतरफा कार्रवाई कर दी जाती है। पिछले कुछ दिनों से ऐसा ही एक बयान मेघालय हाईकोर्ट के जज की तरफ से आया है, जिस पर हंगामा मचा हुआ है।

जज सुदीप रंजन सेन ने अपनी एक टिप्पणी में प्रधानमंत्री मोदी से अपील करते हुए कहा कि भारत कहीं इस्लामिक देश न बन जाए। उन्होंने आगे जोड़ा कि देश में ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए, जिससे बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से आने वाले हिन्दू, सिख, बौद्ध, खासी और गारो समुदाय के लोगों को भारत की नागरिकता आसानी से मिल सके। साथ ही भारत को इस्लामिक देश बनाने जैसी कोई कोशिश नहीं की जानी चाहिए। यदि ऐसा होता है तो वह दिन भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए “कयामत का दिन” होगा।  तटस्थ होकर सोचा जाए तो उनके बयान में आपत्तिजनक जैसा कुछ नहीं है, लेकिन दुर्भाग्य है कि भारत में ऐसी बातें भी ‘विवादित’ मान ली जाती हैं। अब फारुख अब्दुल्ला और असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता और कई तथाकथित बुद्धिजीवी पत्रकार सेन के इस बयान पर तिलमिलाए हुए हैं। धर्मनिरपेक्ष देश के नाम पर उन्हें अपने पद की मर्यादा न भूलने की नसीहतें दी जा रही हैं, लेकिन कोई भी उनके उठाए मुद्दे पर चिन्तन करने को तैयार नहीं है।

एक जज होने के नाते उन्हें यह कहना चाहिए या नहीं, इससे एक कदम आगे बढ़कर हमें यह सोचना चाहिए कि उन्होंने जो कहा, वह सही है या नहीं? सत्य के धरातल पर उनकी कही बातें मुनासिब है या नहीं? भारत में तेज़ी से बदलते जनसांख्यिकी आंकड़ों पर एक गंभीर चिन्तन की सख्त ज़रूरत है। एक वर्ग विशेष की आबादी बढ़ने के बाद बाकी धर्म के लोगों के साथ क्या सलूक होता है, यह बात हमें पाकिस्तान को देखकर समझ आ जानी चाहिए। पाकिस्तान से हम सबक न लेना चाहें तो अफगानिस्तान, सीरिया, इराक और ईरान को देखकर भी समझा सकता है। इसके बाद भी हमें और उदाहरण चाहिए तो जर्मनी, फ्रांस जैसे देशों में शरणार्थियों द्वारा की जा रही हिंसा की घटनाओं पर गौर कर लेना चाहिए। इनके बाद भी यदि हमारी नींद नहीं खुलती है तो फिर हमें भी जज साहब के बयान की निंदा शुरू कर देनी चाहिए।

                                                                                                                                                                       -सचिन पौराणिक

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