कांग्रेस के लिए अच्छी खबर नहीं

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“ वो सिकंदर ही दोस्तों कहलाता है, हारी बाज़ी को जितना जिसे आता है “, यह गाना वैसे किसी फिल्म का है, लेकिन असल जिंदगी में भी जीतने वाले ही याद रह जाते हैं। हारने वालों को कोई याद नहीं करता है न कोई पूछता है। राजनीति में भी ऐसा ही है। जीती बाज़ी हारी जा सकती है और हारी हुई बाज़ी को जीता भी जा सकता है। सशक्त रणनीति और मुद्दों को घुमाने का हुनर यदि आपमें है तो आपके लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं है।

तीन राज्यों छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में होने वाले चुनाव के पहले आम धारणा यही थी कि यह चुनाव भाजपा के लिए कठिन होने वाले हैं। छत्तीसगढ़ में भाजपा जीत भी जाए, लेकिन मध्यप्रदेश और राजस्थान भाजपा के हाथ से फिसलने वाले हैं, यह सभी तय मानकर चल रहे थे। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में वोटिंग हो चुकी है, लेकिन राजस्थान में वोटिंग होनी बाकी है, लेकिन सुदूर क्षेत्रों से आ रही खबरों और जमीनी कार्यकर्ताओं की माने तो कांग्रेस के लिए अच्छी खबर नहीं आ रही है।

मध्यप्रदेश,  छत्तीसगढ़ में मतदान समाप्त होते ही यहां के भाजपा नेता राजस्थान चुनाव में प्रचार करने पहुंच चुके हैं, लेकिन कांग्रेस के नेता पंजाब में आपस में ही लड़ने में लगे हैं। सिद्धू की पाकिस्तान यात्रा और उसके बाद लौटते ही उनका बयान ‘’मेरे कैप्टन राहुल गांधी हैं,’ से पंजाब कांग्रेस के नेता भड़के हैं। कई मंत्रियों ने खुलकर सिद्धू के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और कह दिया है के यदि वे अमरिंदर को अपना कैप्टन नहीं मानते तो उन्हें राहुल गांधी द्वारा सौंपे गए कार्य ही करना चाहिए और पंजाब में दखल बंद कर देना चाहिए। मीडिया की सारी कवरेज और भाजपा का ध्यान भी पंजाब कांग्रेस की सर-फुटौव्वल पर टिका है।

कांग्रेस नवजोत सिद्धू जैसे नेता का भी चुनाव में उपयोग नहीं कर पा रही है जबकि भाजपा के सभी क्षेत्रीय नेता राजस्थान पहुंच चुके हैं। शिवराज सिंह, रमन सिंह से लेकर योगी आदित्यनाथ तक लगातार राजस्थान में रैलियां कर रहे हैं जबकि देश के एकमात्र बड़े राज्य में शासन कर रही कांग्रेस वहां भी ठीक से काम नहीं कर पा रही है। कांग्रेस का ध्यान राजस्थान चुनाव जीतने और सरकार से सवाल पूछने पर होना चाहिए था, लेकिन अब कांग्रेस सिद्धू विवाद पर जवाब देते घूम रही है। यदि राजस्थान में भी कांग्रेस हार जाती है तो हारी बाज़ी को जीतने और जीती बाज़ी हारने का एक उत्तम उदाहरण राजस्थान में देखने को मिलेगा ।

करतारपुर साहिब कॉरिडोर का श्रेय लेकर सिद् का कद राष्ट्रीय राजनीति में कई गुना बढ़ चुका है, लेकिन यदि उनका उपयोग चुनाव जीतने में कांग्रेस नहीं कर पाती है तो फिर ये सब किस काम का?  कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अपने बड़े नेताओं का उपयोग करने में नाकाम है जबकि भाजपा का नेतृत्व अपने छोटे से कार्यकर्ता से भी काम लेना बखूबी जानते हैं। विधानसभा चुनाव में अपने औसत प्रदर्शन का ठीकरा कांग्रेस में सिर्फ शीर्ष नेतृत्व पर फूटना चाहिए। हारी बाज़ी जीतने वाला यदि सिकंदर है तो जीती हुई बाज़ी हराने वाला कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व है।

-सचिन पौराणिक

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