जाको प्रभु दारुण दुख देहि..

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बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि “ठोकर खाकर ही इंसान ठाकुर बनता है।” बात सच भी है क्योंकि जो इंसान प्रयत्न करता है वही सफलता भी अर्जित करता है। बेशक सफलता सीधे नहीं मिलती, ज़मानेभर की ठोकरें खानी पड़ती हैं, एड़ियां घिसनी पड़ती हैं| कई बार असफल होने के बाद भी हिम्मत रखकर लगातार प्रयास करने होते हैं, तब कहीं जाकर सफलता की एक झलक दिखाई देती है।

कई लोग प्रयत्न करने के बाद भी इसलिए असफल हो जाते हैं कि वे एक ही गलती बार-बार किए जाते हैं। एक ही पत्थर से ठोकर खाते जाना समझदारी कहीं से भी नहीं है बल्कि अव्वल दर्जे की बेवकूफी ज़रूर है। कल से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का एक ट्वीट चर्चा में है, जिसमें वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय पर हिन्दू विचारधारा को प्रोत्साहन दिए जाने के आरोप लगा रहे हैं। ये आरोप राहुल गांधी तब लगा रहे हैं, जब प्रधानमंत्री कुछ दिन पहले ही बनारस दौरा करके गए हैं।

राहुल गांधी की राजनीतिक परिपक्वता पहले से ही सवालों के घेरे में है और ऐसे में हिन्दू आस्था को लगातार चोट पहुंचाते उनके बयान 2019 की राह में कांटे ही बिछाने का कार्य कर रहे हैं। राहुल गांधी को जब भी फुरसत मिले, तब उन्हें 2014 लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद उनके ही वरिष्ठ नेता एके एंटनी की हार की वजहों पर बनाई गई रिपोर्ट अवश्य पढ़ लेनी चाहिए। उस रिपोर्ट में साफ वर्णित था कि लगातार मुस्लिमों के हक़ की बात करते रहना और बहुसंख्यक वर्ग को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना मतदाताओं के कांग्रेस से दूर होने की बड़ी वजह था।

राहुल गांधी ने यह रिपोर्ट पढ़ी होगी, यह पक्का नहीं, लेकिन किसी नेक सलाहकार की राय से वे गुजरात और कर्नाटक के चुनाव में अपने आप को जनेऊधारी हिन्दू और शिवभक्त बताते नहीं थक रहे थे। कर्नाटक चुनाव के समय एक सभा में राहुल गांधी ने कैलाश मानसरोवर यात्रा करने की इच्छा भी प्रकट की थी। हालांकि मानसरोवर यात्रा शुरू भी हो गई, लेकिन युवराज ने अब तक इस बात का पुनः जिक्र नहीं किया है। उनके हालिया बयान कि ‘कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है’ सुनकर लगता है कि युवराज के सलाहकार बदल गए हैं। इसके अलावा आज संसद में पर्याप्त नंबर के बिना अविश्वास प्रस्ताव लाना भी किसी को समझ नही आ रहा है।

सलाहकारों की बात इसलिए कि जा रही है क्योंकि आजकल सभी समझने लगे है कि राहुल गांधी की किसी भी विषय पर कोई मौलिक राय नहीं है। वे हर विषय पर सिर्फ उतना ही स्टैंड लेते हैं, जितना उन्हें बताया जाता है।

उदाहरण के तौर पर महिला आरक्षण बिल पर राहुल गांधी सरकार को समर्थन देना चाहते हैं, लेकिन मुस्लिम महिलाओं की बेहतरी के लिए लाए जा रहे तीन तलाक और हलाला के विरुद्ध कानून पर वे टिप्पणी करने से भाग रहे हैं। कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी वाले बयान पर भी कांग्रेस प्रवक्ताओं को जवाब देते नहीं बन रहा है और राहुल खुद भी इस बयान को न खारिज कर रहे न ही स्वीकार कर रहे हैं।

अवकाशकालीन राजनीति की सोच से ग्रसित कांग्रेस के कथित युवा नेता यदि सोचते हैं कि हिन्दू आस्था पर चोट पहुंचाकर सिर्फ मुस्लिमों के वोट बटोरकर वे 2019 में नरेंद्र मोदी का विजयरथ रोक पाएंगे तो उनके लिए परमात्मा ने शायद कुछ और ही सोच रखा है।

तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में एक चौपाई लिखी है- “जाको प्रभु दारुण दुख देहि, ताकी मति पहले हर लेहि” अर्थात जिन्हें भी परमात्मा अतिशय कष्ट देने की ठान लेते हैं, उनकी बुद्धि पहले हर लेते हैं। कांग्रेस की रणनीति 2019 के लिए यदि इसी तरह की राजनीति है तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि मोदी अपने अकेले के दम पर इस बार 300 से ज्यादा सीटें जीतेंगे और कांग्रेस के लिए अब तक का सबसे खराब दौर अब ज्यादा दूर नहीं है।

-सचिन पौराणिक

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