Talented View: ज़िद्दी लोगों का भी कुछ इलाज हो… नहीं तो हिंदुस्तान तबाह हो जाएगा

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निजामुद्दीन की घटना पर देश स्तब्ध है। कुछ लोगों की जहालत की कीमत अब सबको चुकानी पड़ेगी। सोशल मीडिया पर बड़ा वर्ग इस घटना को एक दूसरे ही नज़रिए से देख रहा है। उन लोगों को ये शंका हो रही है कि कोरोना का इस्तेमाल कुछ लौग अपने शातिर इरादों को अंजाम देने के लिए करना चाहतें है। इसे कुछ लौग ‘कोरोना जिहाद’ का नाम दे रहे है।

इस जिहाद का उद्देश्य ये है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस जानलेवा बीमारी से संक्रमित किया जाए। अगर ये बात सच साबित होती है तो ज़मीन जिहाद, लव जिहाद, जनसंख्या के बाद अब ये जिहाद भी देश की नाक में दम कर देगा। और देखा जाए तो ये जिहाद देश के लिए सबसे खतरनाक साबित होगा क्योंकी इसका कोई इलाज़ ही नही है। इस थ्योरी के पीछे हालांकि कोई ठोस तथ्य नही है लेकिन इसे खारिज करने के लिए भी कोई सबूत हमारे पास नही है।

कल जब मस्जिद से निकले इन कोरोना संदिग्धों को बस में बैठाया जा रहा था तब जो हुआ उससे इस जिहादी थ्योरी को और बल मिला। बसों के शीशों से ये लौग जानबूझकर बाहर थूक रहे थे और खांस रहे थे। एक पुलिस वाले के ऊपर भी एक शख्स द्वारा थूका गया है। इन हरकतों के चलते बसों के शीशे भी बंद करवाने पड़े। इसके अलावा कई मौलवियों के बयान भी टीवी पर सुने। वो कह रहे है कि मस्जिद में जाकर नमाज़ पढ़ने वाले का कोरोना वाईरस कुछ नही बिगाड़ सकता। कई जाहिल मौलाना ये भी कहते दिखाई दिए कि हम मस्जिद और नमाज़ किसी भी परिस्थिति में बंद नही करेंगे।

ये सब सुनकर एक कहावत याद आती है। कहतें है नारी से भी ज्यादा श्रृंगार एक हिजड़ा करता है, क्योंकि उसे खुद को नारी दिखाना होता है। ऐसा ही यहां भी हो रहा है। मुस्लिमो का सबसे बड़ा तीर्थ ‘काबा’ इस समय कोरोना के चलते बंद है, ईरान ने शुक्रवार की सारी नमाजे बंद कर दी है, बाकी मुस्लिम देशों ने भी अपनी मस्जिदों पर ताले डाल दिए है। लेकिन भारत के मौलाना न जाने कौन से इस्लाम को मानतें है जो ये अब भी मस्जिदों में नमाज़ रोकने को तैयार नही है।

इनके मजहबी स्थल आज देश मे कोरोना महामारी के अड्डे बन गए है लेकिन ये अपने ‘कुतर्कों’ से बाज़ आने को तैयार नही है। ये कह रहे है मौत ऊपर वाले के हाथ में है और अगर मस्जिद में मौत आती है तो ये तो सबसे अच्छी बात होगी। ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें सुनकर समझ आता है कि इन्हें कोरोना की गंभीरता का अंदाज़ा ही नही है। सामान्य समझ की बातें इन्हें समझ आ नही रही है लेकिन नागरिकता कानून तुरन्त इन्हें समझ आ गया।

खेर, समझाया उसे जाता है जिसके पास बुद्धि हो,समझ हो और समझने की नीयत हो।उल्टे घड़े पर गंगा उड़ेल दी जाए तब भी वो खाली ही रहता है। इसलिए अब सरकार को सोचना है कि जहालत से भरे इन ‘प्राणियों’ का क्या करना है? हमारे समर्पित डॉक्टर्स और नर्सिंग स्टाफ की कीमती जान इन जाहिलों के लिये खतरे में डालना कतई मुनासिब नही है। इनकी बेवकूफी की सज़ा बेचारे डॉक्टर्स, नर्सेस और बाकी मरीज़ क्यों भुगतें? गृहमंत्री, प्रधानमंत्री और पुलिस प्रशासन इन गँवारो से सख्ती से निपटे। नही तो ये देश के ऐसे हालात बना देंगे कि 21 दिन की बजाय 21 महीने के लॉकडाउन से भी काम नही बनेगा।

-Sachin Pauranik

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