नौ दिन चले अढ़ाई कोस

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15 लाख रुपए बैंक अकाउंट में डालने की बात को लेकर विपक्ष प्रधानमंत्री को जुमलेबाज कहता है तो भाजपा वाले भी आजकल कुत्ता, बिल्ली, सांप, नेवला तक आ पहुंचे हैं। यदि जुमलों की ही बात की जाए तो देश के दो सदाबहार जुमलों का कोई मुकाबला नहीं है। पहला “आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता” और दूसरा “कानून सबके लिए बराबर होता है।”

आज हमारा ध्यान सिर्फ दूसरे जुमले की तरफ है। महज 2 दिन पहले तक “कानून जीत गया”, “आखिर इंसाफ की जीत हुई” और “कानून जिंदा है” जैसे नारे बुलंद करने वालों को जोर का झटका देते हुए जोधपुर कोर्ट ने काले हिरण शिकार मामले में सलमान खान को जमानत दे दी। आज सुबह के अखबार में जब देखा था कि सलमान के फैसले की सुनवाई करने वाले जज का तबादला हो चुका है, तभी यह यकीन हो चुका था कि सलमान को जमानत मिलना अब सिर्फ औपचारिकता ही है।

अब कुछ तीखे सवाल हमारी न्यायपालिका से पूछना चाहता हूं कि यदि इस देश में कानून सबके लिए बराबर है तो सलमान की जगह कोई आम आदमी होता, तब भी क्या हमारा सिस्टम इसी तेजी से कार्य करता? 20 साल लग गए जिस केस में सजा सुनाने को, उसमें जमानत मिलने में 2 दिन का समय भी नहीं लगा, यह सलमान जैसे पैसे वालों का हमारे न्याय तंत्र के मुंह पर करारा तमाचा नहीं है क्या? जिस अंदाज में जेलर के सामने पैर फैलाकर सलमान बेफिक्री से बैठे थे, उससे ही यह साफ हो गया था कि पुलिस हो या कोर्ट पैसे वालों के सामने आते ही ये उनकी चापलूसी करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। ‘भाई’ की थोड़ी खातिर करने से आसानी से ‘लक्ष्मी दर्शन’ करने को मिल रहा है तो हमारे कानून के रखवाले ऐसा मौका छोड़ देंगे क्या?

बेचारे आम अपराधी के पास है ही क्या हमारे अधिकारियों को देने के लिए, जो उन्हें ‘भाई’ जैसी इज्जत नसीब हो। यदि आपके पास पैसा है तो आप चाहे फुटपाथ पर सोते लोगों पर कार चढ़ाएं या फिर किसी संरक्षित प्रजाति के जानवर का शिकार करें, भारत के कानून में हिम्मत नहीं है कि आपका बाल भी बांका कर सके। ऐसी लाचार कानून व्यवस्था पर यकीन कोई आम आदमी कैसे कर सकता है? कानून के हाथ लंबे जरूर हैं, लेकिन किसी अपराधी को जेल में डालने के लिए नहीं बल्कि उसकी जेब से माल निकलवाने के लिए। इस कानून व्यवस्था की आए दिन अलग-अलग केसों में धज्जियां उड़ा दी जाती हैं और हम कहते हैं कानून सबके लिए एक समान है? ईमानदारी का ढोंग करने वाले हमारे न्याय प्रणाली से जुड़े लोगों को अपने दिल पर हाथ रखकर एक सवाल खुद से पूछना चाहिए कि क्या आप खुद को इस काबिल मानते हैं कि किसी को सच में न्याय दे सके? बिल्कुल नहीं, आपको अपनी जेबें गर्म करने से फुरसत ही नहीं है।

यदि सलमान को जमानत नहीं मिलती तो देश के लोगों में एक उम्मीद (झूठी ही सही) जागती है कि न्याय के दरवाजे पर सभी समान हैं, लेकिन न्यायपालिका ने लोगों को यह गलतफहमी भी नहीं होने दी। 20 साल चले केस में  ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’  की रफ्तार से चलने के बाद दोषी साबित होने पर भी 2 दिन में जमानत मिल रही है तो कोई अपराधी कानून से आखिर क्यों डरेगा? अपराधियों के मन से  न्यायपालिका का खौफ खत्म होता जा रहा है और आम जनमानस के मन में इस सड़ी-गली प्रणाली के प्रति सम्मान। अब कोर्ट को चाहिए कि कोर्ट की अवमानना का कानून भी हटा ही ले क्योंकि यहां भी आप अपना काम ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। आप यदि काम (कारनामे) ऐसे कर रहे हैं तो आपको जनता का गुस्सा और गालियां भी झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। जनता भी आखिर कब तक बर्दाश्त करे आपकी नाकारी को?

-सचिन पौराणिक

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