मुद्दे को सकारात्मक तौर पर लेने की जरूरत

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कुछ महीने पहले दोस्तों के साथ थाईलैंड के ‘कोरल आइलैंड’ जाना हुआ। कोरल आइलैंड एक बेहद सुंदर जगह है और दुनियाभर के वाटर स्पोर्ट्स के शौकीनों को यह जगह आकर्षित करती है। घने जंगल और पहाड़ों के नज़ारों के बीच दुनिया के अलग-अलग भागों से आए सैलानियों के साथ यहां बिताए पल ताउम्र के लिए यादगार बन जाते हैं। यहां सैलानी अपनी पसंद के वाटर स्पोर्ट का खुलकर मज़ा लेते हैं। कई सैलानी और एक्टिविटीज़ होने की वजह से हर सैलानी, जिसे वाटर स्पोर्ट में भाग लेना होता है, उसके हाथ की कलाई पर वाटरप्रूफ मार्कर से एक कोड डाल दिया जाता है, जिससे स्पोर्ट करवाने वालों की उलझन कम हो सके। इस कोड से उन्हें पता चल जाता है कि सैलानी को  कौन सी एक्टिविटी करवानी है।

अंडमान के ‘एलिफेंट आइलैंड’ पर भी ऐसा ही होता है। यहां वाटर स्पोर्ट के अलावा जिस बोट से आप यहां तक पहुंचते हैं, उसका कोड भी आपके हाथ पर डाल दिया जाता है। इससे यह फायदा भी होता है कि लौटते समय यदि आप अपनी बोट भूल भी जाएं तो बोट वाला खुद इस कोड से आपको ढूंढ लेता है। गोआ हो या तारकरली तकरीबन हर जगह जहां पर्यटकों की भारी भीड़ उमड़ती है, वहां ऐसे कोड डाले जाते हैं, जिनका कोई नुकसान नहीं बल्कि फायदे ही फायदे नजर आते हैं। कोई पर्यटक कभी इनका विरोध करता नजर नहीं आता है।

कल से इस खबर पर हंगामा मचा हुआ है कि मध्यप्रदेश के धार में पुलिस आरक्षक भर्ती प्रक्रिया के दौरान मेडिकल जांच के दौरान अभ्यर्थियों के सीने पर एससी, एसटी और जनरल लिख दिया गया। खबर मीडिया में आते ही खलबली मच गई और इंदौर एडीजी इसकी जांच करवाने की बात कह रहे हैं। इस प्रकरण पर राजनीति भी शुरू हो गई है और कई नेता इसे आरक्षित वर्ग का अपमान बताने में लगे हैं। सवाल वही है कि भेदभाव इसमें आखिर कहां हुआ है? जनरल वालों के सीने पर भी तो लिखा ही था ‘जनरल’।

इन सबसे इतर सवाल यह होना चाहिए कि इस बात में हंगामा मचाने जैसा क्या है? जहां आरक्षक भर्ती में इतनी बड़ी तादाद में अभ्यर्थी आएंगे, वहां किसी गड़बड़ी से बचने के लिए यदि अभ्यर्थियों के सीने पर उनका वर्ग लिख दिया है तो गलत क्या है? ज्यादा से ज्यादा इस पर चर्चा की गुंजाइश बनती है कि यह वर्ग सीने की जगह हाथ पर लिखा जा सकता था, लेकिन जहां आपके सारे कपड़े उतरवाकर मेडिकल जांच होनी है, वहां ऐसी कुछ व्यवस्था बनानी ही पड़ती है, जिससे परीक्षा आयोजकों को सुविधा हो सके। यदि किसी को अपनी ‘जाति’ बताने में शर्म आ रही है तो फिर जाति के नाम पर आरक्षण पाने में भी शर्म आनी चाहिए। यह क्या दोहरा रवैया हुआ कि सरकारी नौकरी के लिए ट्रम्प कार्ड की तरह जाति बाहर निकालो और फिर इस्तेमाल के बाद उसको वापस जेब में सुरक्षित रख लो। पदोन्नति में आरक्षण और बाकी सुविधाओं के लिए फिर जाति का इस्तेमाल करो और फिर वापस अगले प्रयोग के लिए सम्हालकर जेब मे रख लो। यह बात तर्कसंगत नहीं लगती।

भगवान ने सभी इंसानों को बराबर बनाया, लेकिन हमने उन पर जातियों के टैग लगा दिए। बदलते समय के साथ आज की युवा पीढ़ी जाति पर आधारित किसी भेदभाव को स्वीकार नहीं करती, लेकिन आरक्षण युवाओं के बीच एक ऐसी लकीर खींच रहा है, जिससे यह भेदभाव पूरी तरह खत्म नहीं हो पा रहा है। बड़ी सीधी बात है यदि आप जाति के नाम पर नौकरी ले रहे हैं तो फिर जाति को छिपाना भी सही नहीं है। साहस ऐसा होना चाहिए कि आरक्षण की सीढ़ी चढ़कर बने डॉक्टर को अपने क्लिनिक पर लिखना चाहिए कि ‘आरक्षित कोटे से’।

जनता को यह जानने का हक होना चाहिए कि जिस डॉक्टर के हाथ में उनकी जान है, वह मेरिट से डॉक्टर बना है या आरक्षण से? यदि ऐसा नहीं कर सकते तो कम से कम इतनी छोटी बातों का बतंगड़ भी नहीं बनाना चाहिए। पर्यटन स्थलों पर हाथ पर लिखे कोड से जैसे कोई सैलानी शर्मिंदा नहीं होता, वैसे ही जाति के ठप्पे से भी किसी को शर्मिन्दा नहीं होना चाहिए। इस मुद्दे पर हंगामा करने के बजाय इसे सकारात्मक तौर पर लेने की जरूरत है।

-सचिन पौराणिक

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