जो सवाल ही नहीं, उनके जवाब दे रहे मोदी

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एक चर्च में पादरी कुछ ज्ञान की बातें बता रहा था और ज्यादातर लोग उबासियां ले रहे थे। पादरी समझ नहीं पा रहा था कि लोग उसकी बातों में रुचि क्यों नहीं ले रहे हैं? हर रविवार वह ज्ञान की कई बातें बताता और लोग हमेशा की तरह उदासीन रहते थे। एक बार किसी बड़े संत से पादरी की मुलाकात हुई, तब यही सवाल उसने संत से भी पूछा कि लोग मेरी बातों में रुचि क्यों नहीं लेते हैं? संत ने सहज भाव से जवाब दिया कि लोग तुम्हारी बातों से इसलिए आकर्षित नहीं होते क्योंकि तुम चर्च में उन सवालों के जवाब देते हो, जो किसी के सवाल ही नहीं हैं।

कल देश मे दो बड़ी घटनाएं घटीं। पहली लोकसभा और विधानसभा सहित कई उपचुनावों के नतीजे आए, जिनमें सत्तारूढ़ भाजपा का प्रदर्शन बेहद खराब रहा और दूसरी यह कि नोटबंदी के बाद से पहली बार वित्त वर्ष 2017-18 की आखिरी तिमाही में जीडीपी विकास दर रिकॉर्ड 7.7 फीसदी दर्ज की गई। नोटबंदी के बाद से यह अब तक कि सबसे ज्यादा विकास दर है, जो सिद्ध करती है कि आर्थिक मोर्चे पर केंद्र सरकार सही दिशा में काम कर रही है।

कांग्रेस ने देश पर लगभग 60 साल सफलतापूर्वक शासन किया क्योंकि उनको पता है कि शासन कैसे चलाते हैं। कांग्रेस भली-भांति समझती है कि उसका कोर वोटर कौन है और अपने वोटर को खुश करने में कांग्रेस ने कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। आप इसे तुष्टिकरण का नाम दें चाहे वोट बैंक राजनीति का, लेकिन सच्चाई यही है कि लोकतंत्र में बहुमत ही शासन करता है और बहुमत को हासिल करना एक विधा है। कांग्रेस ने बिना किसी शर्म या हिचक के अपने वोटरों को खुश करने के तमाम यत्न किए तभी वे इतने वर्ष सत्ता में रह सके क्योंकि लोकतंत्र असल में संख्यातंत्र है, जहां सिर्फ सिर गिने जाते हैं (वे खाली हों तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता है)।

2014 में कांग्रेस के इसी किले को ध्वस्त करके सत्ता में आए नरेंद्र मोदी ने इससे पहले गुजरात में सफलतापूर्वक शासन किया। गुजरात में उनकी सफलता का राज सिर्फ विकास नहीं था बल्कि उनकी छवि थी, जो 2002 के दंगों के बाद ‘उग्र हिंदुत्ववादी’ के रूप में उभरकर सामने आई थी। यदि सिर्फ विकास के भरोसे मोदीजी बैठे रहते तो गुजरात में लगातार जीतना संभव ही नहीं था। लोगों ने उन पर भरोसा जताया इसलिए कि वे बहुसंख्यक आबादी के गौरव का प्रतीक बन चुके थे। इसी हिंदुत्ववादी छवि के कारण देशभर में उनकी लोकप्रियता बढ़ती चली गई और जनता ने उन्हें दिल्ली के तख्त तक पहुंचा दिया।

गलतफहमी किसी को भी हो सकती है। लगातार राज्य दर राज्य चुनाव जीतने पर मोदीजी को भी शायद यह गलतफहमी हो गई कि लोग मत-मजहब-संप्रदाय से ऊपर उठकर उनके विकास को पसंद कर रहे हैं, लेकिन मुस्लिम बाहुल्य कैराना में जिस तरह सहानुभूति लहर पर सवार होकर भी भाजपा हार गई, उससे स्पष्ट संकेत पूरे देश को मिल चुका है कि मोदीजी के विकास में देश की जनता के एक बड़े हिस्से को कोई विशेष रुचि नहीं है। जिन्हें रिझाने के लिए मोदीजी रमज़ान में संघर्षविराम करवा रहे हैं, जिन महिलाओं को तीन तलाक से छुटकारा दिलवाना चाह रहे हैं, रेलवे कर्मचारियों को रोज़े खोलने के लिए जल्दी छुट्टी दे रहे हैं, अज़ान की आवाज़ सुनते ही माइक पर बोलना रोक देते हैं, उन सबको मोदीजी की किसी बात का कोई आकर्षण नहीं है। उनके तमाम प्रयासों पर कभी वोट की मोहर नहीं लगने वाली।

ये बातें कोई कच्ची उम्र का बालक भी देख और समझ सकता है, लेकिन दशकों के राजनीतिक अनुभव वाले संघ और भाजपा के रणनीतिकार क्या इतनी आसान बातें भी नहीं समझ पा रहे हैं? देश की जनता इसलिए भी मोदीजी से ऊबने लगी है क्योंकि वे भी उस पादरी की तरह उन सवालों के जवाब देते जा रहे हैं, जो किसी के सवाल ही नहीं हैं। जनता आपसे राममंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता के सवाल पूछ रही है और आप विकास का झुनझुना बजाने में मग्न हो रहे हैं…

क्रमशः

-सचिन पौराणिक

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