‘मॉब लिंचिंग’ का स्वार्थसिद्धि के लिए प्रयोग

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मनोविज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो भीड़ में इंसान वह काम कर लेता है, जो अकेले में करना उसके लिए कभी संभव नहीं है। किसी महिला के साथ बदतमीज़ी हो या फिर किसी दुकान को लूटना, गाड़ियों में आग लगानी हो या किसी की हत्या करना, ये सब तभी संभव है, जब इंसान भीड़ में शामिल हो। भीड़ बनती इंसानों से ही है, लेकिन चूंकि भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता, भीड़ का कोई उसूल नहीं होता इसलिए अक्सर गुस्से में आकर भीड़ वह कर देती है, जिससे मानवता शर्मसार हो जाती है।

राजस्थान के अलवर में भीड़ ने एक शख्स की गो तस्कर समझकर पीट-पीटकर हत्या कर दी और बाड़मेर के एक दलित युवक की सिर्फ इसलिए हत्या हो जाती है कि वह एक मुस्लिम महिला से प्यार करता था। आपको बता दें कि बाड़मेर भी राजस्थान में ही है और हत्या भी भीड़ ने ही की है। मीडिया में अलवर के रकबर पर लगातार चर्चा चल रही है और बाड़मेर की घटना का कहीं कोई जिक्र भी नहीं हो रहा है।

‘मॉब लिंचिंग’ यानी भीड़ द्वारा की गई हत्याएं आजकल सुर्खियां बनी हुई हैं। एक स्वस्थ लोकतंत्र में भीड़ द्वारा की जा रही इस हिंसा को किसी भी लिहाज़ से उचित नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि भीड़ ही यदि इंसाफ करने लगेगी तो पुलिस, कानून, अदालतों का क्या होगा? देश की सुप्रीम कोर्ट भी लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं से चिंतित है और उन्होंने सरकार को इस सिलसिले में फटकार भी लगाई है।

इन सबके बीच सवाल यह भी होना चाहिए की तमाम तरह की लिंचिंग में गोहत्या वाली लिंचिंग ही सुर्खियां क्यों बनती है? क्या लिंचिंग भी दो तरह की होने लगी है, एक कम्युनल लिंचिंग और दूसरी सेक्युलर लिंचिंग? जो लिंचिंग राजनीति करने के लिए सही लगती है, उस पर कई नेता और पार्टियां हंगामा मचाती हैं, लेकिन बाकी लिंचिंग पर आंख मूंदकर बैठ जाते हैं। लिंचिंग नाम अब प्रचलित हो रहा है, लेकिन 1984 में सिखों का और उसके बाद 90 के दशक में कश्मीर घाटी में हिन्दू पंडितों की लिंचिंग किसने की? दिल्ली के अंकित सक्सेना और कासगंज के चंदन गुप्ता की लिंचिंग किसने की? केरल के पलक्कड़ में मुट्ठीभर चावल चुराने वाले शख्स की किसने लिंचिंग की? ये सब अपराध सुर्खियां क्या सिर्फ इसलिए नहीं बन सके क्योंकि यहां मरने वाला अल्पसंख्यक नहीं था?

हर बात पर गाय को मुद्दा बनाने वालों को यह बताना चाहिए कि क्या भारत में गायों की तस्करी और अवैध रूप से उनका कत्ल नहीं किया जाता? क्या देश के बहुसंख्यक समाज के लिए पूजनीय होने के बाद भी कई लोगों को गाय का मांस बेहद लज़ीज़ नहीं लगता? क्या गायों पर अत्याचार नहीं किए जाते हैं? जिस अलवर की यह घटना है, वहां से हरियाणा तक का इलाका क्या गो तस्करी के लिए कुख्यात नहीं है?

गाय के नाम पर इंसान की हत्या कहीं से भी जायज नहीं ठहराई जा सकती, लेकिन गोवंश के ऊपर होने वाले अत्याचारों को रोकना भी जरूरी है और सबसे बड़ा ऐतराज इस बात पर होना चाहिए कि कुछ कथित गोरक्षकों की आड़ लेकर विराट हिन्दू धर्म को बदनाम क्यों किया जा रहा है? जब हजारों बेगुनाहों की हत्या करने वाले आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं माना जाता तो मुट्ठीभर कथित गोरक्षकों के नाम पर हिन्दू धर्म पर अंगुली उठाना कैसे जायज ठहराया जा सकता है? आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं होता तो गोरक्षकों को भी किसी धर्म से जोड़ा जाना सरासर गलत है।

भीड़ द्वारा की गई सभी हिंसा एक क्रूर अपराध है और सभी की बराबर निंदा की जानी चाहिए चाहे वह गाय के नाम हो या फिर राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के नाम पर, चाहे झारखंड में हो चाहे केरल में हो। किसी एक विशेष घटना पर बवाल मचाना और बाकी घटनाओं पर चुप्पी साध लेने में कुछ राजनीतिक दल और मीडिया घराने निष्णात हो चुके हैं। ऐसे लोगों को पहचानने की जरूरत है, जो लिंचिंग जैसी घटनाओं का भी इस्तेमाल स्वार्थसिद्धि में कर लेते हैं|

-सचिन पौराणिक

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