भाजपा के पास कुबेर का खजाना

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कुछ दिन पहले भाजपा के किसी मंडल अध्यक्ष से मुलाकात हुई। बातों-बातों में वे बोले- आपसे एक काम है आज। मैंने कहा बताइये, क्या काम है?

“इस बार मैं पार्टी से जुड़े काम के लिए आपके पास आया हूं। हम भाजपा का सदस्यता अभियान चला रहे हैं, उसमें आप भी सदस्य बन जाइए।” उन्होंने कहा।

“लेकिन मैं मीडिया से जुड़ा हूं और ऐसे में किसी पार्टी की सदस्यता लेना सही नहीं होगा क्योंकि हम तो वक्त आने पर सभी को आईना दिखा देते हैं।” मैंने इनकार के स्वर में कहा।

“पार्टी की तरफ देखकर नहीं बल्कि मेंरी तरफ देखकर आप सदस्यता लीजिये।” उन्होंने आग्रह किया।

“मैंने भी सोचा ठीक है इतना कह रहे हैं तो। क्या करना होगा इसके लिए?” मैंने पूछा।

“एक रसीद कटवाना पड़ेगी 1 हजार रुपए की” थोड़े संकोच के साथ उन्होंने कहा।

1000 की रसीद की बात सुनकर मेंरा माथा ठनक चुका था। मैंने कहा, कहां तो आप लोग मिस्ड कॉल से भी सदस्य बना रहे हैं और कहां यह 1000 रुपए की रसीद। माफ़ कीजिये मुझे नहीं बनना आपकी पार्टी का सदस्य। मैंने उखड़ते हुए जवाब दे दिया।

थोड़ा झेंपते हुए वे बोले, 1000 रुपए कोई ज्यादा बड़ी रकम नहीं है और आपका कुछ काम भी होगा तो हम करवा देंगे, लेकिन मैंने साफ कर दिया कि मैं 10 रुपए भी इस काम के लिए नहीं दूंगा। मुझे लेनी ही नहीं भाजपा की सदस्यता।

मेंरे रवैये से वे थोड़ा निराश हुए, लेकिन आज जब मैंने खबर पढ़ी कि भाजपा देश की सबसे अमीर पार्टी बन गई है तो समझ में आया कि यह सब कैसे हुआ होगा? भाजपा के करोड़ों सदस्य हैं और ऐसे मंडल अध्यक्ष भी हजारों की तादाद में हैं। यदि ऐसे ही उगाही करके सदस्य बनाने थे तो यह मिस्ड कॉल करके सदस्य बनाने की नौटंकी क्यों की गई थी? एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी एडीआर की रिपोर्ट में और भी कई चौंकाने वाली जानकारियां सामने आई हैं।

सोचने वाली बात है कि आखिर कोई राजनीतिक पार्टी को चंदा क्यों देगा? यदि देगा तो सत्ता में आने पर फिर अपने सही-गलत काम करवाने के लिए दबाव नहीं बनाएगा? उसके चंदे के बोझ से दबे नेता क्या उसकी किसी गैर-कानूनी मांग को मानने से इनकार कर सकते हैं? क्या भ्रष्टाचार की जड़ को सींचने का काम यह ‘राजनीतिक चंदा’ नहीं कर रहा? ऐसे बनेगा भ्रष्टाचार मुक्त भारत?

‘राजनीतिक चंदा’ अर्थात  पॉलिटिकल फंडिंग’ भारतीय राजनीति की व गंदी सच्चाई है , जिसे छिपाया नहीं जा सकता। इससे भी ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि आपस में तमाम दुश्मनी रखने वाले दल भी इस मुद्दे पर अपने सारे मतभेद भुलाकर साथ आ जाते है। ये चंदा स्वेच्छा से भी दिया जाता है और जबरन भी वसूला जाता है। भाजपा का चंदा ऐसी ही छोटी-बड़ी रकम जोड़कर अब 1 हजार करोड़ रुपये से भी ऊपर पहुंच गया है और वो भारत की सबसे अमीर पार्टी बन चुकी है। पिछले साल के मुकाबले ये 80% से भी ज्यादा की बढ़ोतरी है।

कांग्रेस के पास जितनी कमायी नहीं है उससे ज्यादा उनके खर्चे है। ऐसे में सवाल है कि ये घाट कहाँ से पूरा हो रहा है? ये आंकड़े एक बानगी भर है असलियत में राजनीतिक चंदा हजारों करोड़ से ऊपर जाता है जिसका कोई हिसाब नहीं रहता है। अपने आप को ईमानदार बताने वाली पार्टियां भी इस मुद्दे पर चुप्पी साध लेती है।

2 अप्रेल और कल 10 अप्रेल को भारत बंद था। व्यापारियों समेंत आम जनता को इन 2 दिनों में करोड़ो का नुकसान हुआ है ऐसे में जनता के मन में सवाल उठता है की ये नेता जो सालों तक विपक्ष में बैठते है, ऐसी कौनसी कमाई करते है जिससे इनकी आलीशान जिंदगी मज़े से चलती रहती है। एडीआर को अपनी रिपोर्टर में ये खुलासे भी करने चाहिए की क्या इन नेताओं के घर भी इसी चंदे से चलते है? ये महंगी गाड़ियां, निजी सुरक्षा बल, निजी स्टाफ कहाँ से आते है इन सबके पैसे? हर आम आदमी अपनी आजीविका चलाने के लिए कुछ करता है लेकिन आम आदमी के नेता होने का दम भरने वालों के पास कौनसा कुबेर का खजाना है जो कभी खाली नहीं होता? कम से कम जनता को पता तो चले की के नेता अपनी आजीविका कैसे चलाते है? लोकतंत्र में जनता ही सबकुछ है तो जनता के सामने ये सब बातें खुलकर आनी ही चाहिए।

-सचिन पौराणिक

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