केजरीवाल ने ऐसे सुपडे साफ़ किये जैसे गाडी वाला आया घर से कचरा निकाल

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दिल्ली की तस्वीर साफ हो चुकी है। भाजपा-आप (BJP-AAP competition) के बीच मुकाबला (Arvind Kejriwal Winning In Delhi) एकतरफा ही साबित हुआ। भारी-भरकम चुनाव प्रचार और शाहीन बाग़ (Shaheen Bagh Movement) के बावजूद भाजपा (BJP) कोई खास कमाल नही दिखा पायी। भाजपा की जितनी सीटें दिखाई दे रही है वो भी लगता है अमित शाह के पूरी ताकत से चुनाव प्रचार करने की वजह से ही आयी है। दिल्ली भाजपा (BJP) के भरोसे ही चुनाव लड़ा जाता तो केजरीवाल 70 की 70 सीटें ही जीत जाते।भाजपा (BJP) की हार की दो सबसे बड़ी वज़हें सामने आ रही है। पहला तो अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal Winning In Delhi)  की टक्कर में कोई दमदार नेता न होना और दूसरा कांग्रेस का निराशाजनक प्रदर्शन। केजरीवाल के खिलाफ भाजपा ने कोई मजबूत मुख्यमंत्री दावेदार नही उतारा लेकिन केजरीवाल (Arvind Kejriwal) ने जानबूझकर मनोज तिवारी (BJP Manoj Tiwari) को अपना प्रतिद्वंद्वी बना दिया। केजरीवाल ने समझदारी से काम लेते हुए प्रधानमंत्री पर अपना निशाना न लगाते हुए मनोज तिवारी (BJP Manoj Tiwari) को ही हर बार निशाने पर लिया।

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कॉंग्रेस (Congress) की आपसी फूट और केंद्रीय नेतृत्व की उदासीनता के चलते कांग्रेस का कैडर दिल्ली में सिकुड़ता जा रहा है। अगर कांग्रेस (Congress) दमदारी से चुनाव लड़ती तो नतीजे भाजपा के पक्ष में मुड़ सकते थे। लेकिन कांग्रेस ने जिस तरह इस चुनाव में आत्मसमर्पण किया उससे केजरीवाल को बड़ा सहारा मिला। क्योंकि अल्पसंख्यक समाज़ का वोट हमेशा से कांग्रेस को ही जाता है। लेकिन कांग्रेस के यूँ हथियार डाल देने से ये एकमुश्त वोट केजरीवाल (Arvind Kejriwal Winning In Delhi)   की झोली में गिर गया।अब तक के रुझान ये इशारा कर रहे है कि शाहीन बाग़ दिल्ली की जनता के लिए बड़ा मुद्दा बन ही नही पाया। केजरीवाल ने बड़ी चालाकी से इस मामले से खुद को अलग कर लिया और जनता से जुड़े बुनियादी मुद्दों पर ही फोकस किया। भाजपा का मंत्र राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय मुद्दे थे तो केजरीवाल स्वास्थ्य, शिक्षा पर अड़े रहे। लगता है आखिर में जनता ने भी भावनात्मक मुद्दों की बजाय बुनियादी मुद्दों को ही तरजीह दी।

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दिल्ली की जनता को इस परिणाम के लिए कोसना या फिर दोष देना कतई जायज़ नही ठहराया जा सकता। क्योंकि इसी जनता ने कुछ महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव (Delhi Assembly Elections 2020) में दिल्ली की सातों सीटें भाजपा की झोली में डाली थी और आम आदमी पार्टी को तीसरे नंबर पर धकेल दिया था। विधानसभा के चुनाव (Delhi Assembly Elections 2020)  के मुद्दे अलग होतें है और केजरीवाल ने कुछ तो ऐसा किया ही है जिससे जनता उन पर इतना विश्वास जता रही है। केजरीवाल (Arvind Kejriwal Winning In Delhi) जनता के साथ सीधा जुड़ पाये जबकि भाजपा के पास कोई उम्मीद्वार नही होने से जनता उनसे नही जुड़ पायी।कहना जरूरी है कि ये सिर्फ शुरुवाती विश्लेषण है। विधानसभा की हर सीट पर पर आंकड़ो का अध्ययन करने के बाद ही कुछ ठोस निष्कर्ष निकाले जा सकते है। बहरहाल भाजपा (BJP) के लिए हालात पिछली बार के मुकाबले बेहतर ही हुए है। किन्तु आत्मावलोकन की आवश्यकता उन्हें भी है। लेकिन चिंताजनक हालात तो कांग्रेस (Congress) के लिए है। वो न तीन में है न तेरह में। शून्य से बाहर निकलने का कोई रास्ता उन्हें सूझ नही रहा है। (Arvind Kejriwal Winning In Delhi)  इतना होने के बाद भी उनके प्रवक्ताओ के चेहरे की खुशी का राज़ समझना बहुत मुश्किल हो चला हैं।

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Sachin Puranik

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