नसबंदी पर भारी राजनीतिक घेराबंदी

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सत्ता (Target To Heath Employees) में आने के बाद अगर सच मे कोई राजनीतिक दल सच में जनता का भला करना चाहे तो कुछ फैसले ऐसे लेने ही पड़ते है जिससे एक वर्ग का गुस्सा भड़क जाता है। ऐसे हालातों में जो सरकार अपने फैसले पर अडिग रहती है वही सच्चे अर्थों में जनता का हित कर पाती है। क्योंकि जनता कभी दबाव और कड़वी दवाई को स्वीकार नही करती जबकि समाज़ के स्वास्थ्य के लिए ये जरूरी होता है।जैसे केंद्र सरकार सीएए लेकर आई तो एक बड़े वर्ग का गुस्सा भड़क उठा। लेकिन केंद्र सरकार अपने फैसले पर अडिग रही लेकिन हर सरकार इतनी शक्तिसम्पन्न और अपने निर्णय पर अडिग नही रह पाती। ऐसा ही एक मामला आया है मध्यप्रदेश में। यहां के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) ने नसबंदी को लेकर एक अजीबोगरीब फरमान जारी किया था। एनएचएम (NHM) ने एमपी के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (Target To Heath Employees) को आदेश दिया है कि कम से कम एक सदस्य की नसबंदी कराओ वरना उनको अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी जाएगी।

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क्योंकि मध्यप्रदेश में कई जिले ऐसे है (Target To Heath Employees) जहां सालों में 5 पुरुषों की भी नसबंदी (Vasectomy) नही हो सकी है। सरकारी महकमा इस मामले ने इतना उदासीन है कि जो नसबंदी कराने के इच्छुक भी है उन तक ये कभी पहुंच नही पाते। स्वास्थ्य कार्यकर्ता नसबंदी को लेकर कितने गंभीर है ये नसबंदी की गिरती संख्या के आंकड़े खुद बयान कर रहे है। जैसा कि सरकारी कर्मचारियों की आदत होती है उसी गति से ये इस काम को कर रहे थे। इसका नतीजा यही हुआ कि- “नौ दिन चले अढ़ाई कोस”लेकिन जब सरकार ने इन कर्मचारियों पर थोड़ी सख्ती दिखाई तो विपक्ष समेत चारो तरफ से हंगामा शुरू हो गया। कर्मचारियों के बढ़ते आक्रोश और भाजपा के विरोध के बीच सरकार ने तुरन्त उल्टे कदम लेते हुए आदेश वापस ले लिया। अब कर्मचारी फिर से पहले की तरह मौज काटेंगे और मुफ्त की तनख्वाह लेते रहेंगे। दबाव में झुकने से जनता में ये संदेश चला गया कि ये सरकार अपने इरादों पर दृढ़ नही है। दबाव में इसे झुकाया जा सकता है।

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अब जिन कर्मचारियों का काम ही नसबंदी करना है उनसे एक भी शख्स की नसबंदी नही हो पा रही है तो क्या ये सही है? जिस काम के लिए कोई तनख्वाह ले रहा है उसी काम को न करे तो इसे क्या कहे? क्या ये कामचोरी नही है? अगर कर्मचारी सही नीयत से काम करे तो क्या ऐसा हो सकता है कि एक आदमी को भी नसबंदी के लिए राजी न करवा पाये? लेकिन सरकारी कर्मचारियों की रफ्तार के हिसाब से जब एक फ़ाइल को एक टेबल से दूसरी टेबल तक जाने में सालों लग जातें है तो नसबंदी भी उसी गति से चल रही थी।समझ नही आता कि पूर्ण बहुमत का दावा करने वाली कमलनाथ सरकार इतनी आसानी से दबाव में क्यों आ जाती है? माफिया पर कार्यवाही भी दबाव से ठंडी पड़ गयी और अब ये आदेश भी वापस हो गया। कमलनाथ सरकार को रुककर ये सोचना चाहिए कि उनका मकसद क्या है? अगर वो सच मे ही जनता की भलाई चाहते है तो विरोध और आलोचना को दरकिनार करते हुए लगातार सख्त कदम उठाने चाहिये। इस तरह पीछे कदम उठाने से सरकार की छवि खराब होती है। अपने निर्णय के साथ शक्ति से खड़े रहना कमलनाथ सरकार को केंद्र की मोदी सरकार से सीखना चाहिए।

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Sachin Pauranik

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