महाराज ने ऐसा रचा खेल, कमलनाथ हो गए फैल

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महाभारत के महाविनाशकारी युद्ध से पहले कौरवों से पांडवों ने सिर्फ पांच गांवों की मांग की थी। पांडवों की तरफ से भगवान कृष्ण खुद वार्ताकार बनकर गए थे। उन्होंने पूरा हस्तिनापुर कौरवों को सौंपने और पांडवों के लिए मात्र 5 गांव की शर्त रखी थी। लेकिन कौरवों ने कहा कि पांच गांव तो छोड़िए श्रीकृष्ण, हम उन्हें सुई के नोक बराबर ज़मीन भी नही देंगे। इसके बाद फिर कौरवों के साथ क्या हुआ ये इतिहास है।ठीक ऐसा ही मध्यप्रदेश में हुआ है। ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia resigned) के नाम पर चुनाव जीता गया लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री तो दूर उपमुख्यमंत्री भी नही बनाया गया। इसके बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद भी कमलनाथ (Kamalnath) ने सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) को न देकर खुद के पास रख लिया। इतना होने के बाद आखिरी सम्मान की स्थिति सिंधिया के लिए यही बची थी कि वो राज्यसभा चले जाएं और केंद्रीय राजनीति में सक्रिय योगदान दें। लेकिन कमलनाथ और दिग्विजयसिंह (digvijay Singh) ने ऐसा खेल रचा की महाराज के लिए राज्यसभा जाना भी मुश्किल हो गया।

कोई भी समझदार नेता अपनी आंखों के सामने अपना इस तरह पतन होते हुए नही देख सकता। इसलिए सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) ने बगावत करी और इसका सीधा खामियाजा कांग्रेस पार्टी (Congress Party) को भुगतना पड़ा। कमलनाथ एक अहंकारी शख्स है ये सब जानतें है। मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद कमलनाथ जिस अंदाज में प्रधानमंत्री के सामने पैर फैलाकर बैठे थे उस मुद्रा से भी उनका अहंकार छलक रहा था। उपर से दिग्गी जैसे उनके सलाहकार बने तो स्थिति ‘करेला वो भी नीम चढ़ा’ वाली बन गयी।महाभारत में जिस तरह धृतराष्ट्र अंधे थे उसी तरह कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी अंधे की तरह ही व्यवहार कर रहा है। पहले असम के नेता हेमंत बिश्वकर्मा के सामने राहुल गांधी अपने कुत्ते को दुलारते रहे तो असम उनके हाथ से निकल गया। इधर सिंधिया को मुलाकात का समय न देकर मध्यप्रदेश भी ‘हाथ’ से फिसल गया। शीर्ष नेतृत्व का नकारापन और मध्यप्रदेश के नेताओं के अहंकार ने कांग्रेस को कहीं का नही छोड़ा।

पिता की तरह अलग पार्टी बनाएंगे ज्योतिरादित्य सिंधिया!

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कोई खुशी से कांग्रेस नही छोड़ी है। उन्होंने लगातार संकेत दिए कि वो नाराज़ है लेकिन उनकी बातें अनसुनी करते हुए कांग्रेस ने उनके पर कतरने जारी रखे। सिंधिया को राज्यसभा भेजकर कमलनाथ मजे से मुख्यमंत्री पद के पांच साल पूरे कर सकते थे। लेकिन उनका अहंकार ठीक वैसा ही था जैसा कौरवों का था। वो पांडवों को सुई की नोक जितनी ज़मीन भी नही देना चाहते थे तो कमलनाथ भी महाराज को एक पद भी नही देना चाहते थे।अहंकार किसी का कैसे नुकसान करवा सकता है ये कमलनाथ ने देश को दिखाया है। अपने अहंकार ने कमलनाथ को कहीं का नही छोड़ा। अब वो न मुख्यमंत्री है, न सांसद, न कांग्रेस के केंद्रीय नेता और 1984 के सिख दंगो में उनकी फ़ाइल भी खुल चुकी है। उनके धुर विरोधी सिंधिया अब सत्ता पक्ष में है और अपने नए साथियों के साथ मिलकर वो कमलनाथ को सबक सिखाने में कोई कसर बाकी नही रखने वाले। कमलनाथ के अहंकार ने न सिर्फ उनका खुद का बल्कि कांग्रेस पार्टी का भी बड़ा नुकसान करवा दिया है।

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Sachin Pauranik

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