कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल सिंधिया!

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काबिल और अनुभवी होने के बावजूद पहले ‘महाराज’ को मुख्यमंत्री (Scindia Can Join BJP) पद नही दिया गया, उसके बाद उप-मुख्यमंत्री भी नही बनाया गया जैसा राजस्थान में सचिन पायलट को बनाया गया। उसके बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की बारी आई तो वहां भी उन्हें ‘टरका’ दिया गया। महाराज के विरोध को अनदेखा करके उनका लगातार अपमान किया गया। इतने अपमान के घूंट पीनेके बाद भी महाराज ने सोचा राज्यसभा जाएंगे और आराम करेंगे। लेकिन ‘पुत्रमोह’ में अंधे हो चुके मध्यप्रदेश के दो वरिष्ठ नेताओं से ये भी नही देखा गया।

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महाराज का राज्यसभा (Scindia Can Join BJP)  टिकट काटने की पटकथा भी जब लिखी जा चुकी तो उनका धैर्य जवाब दे गया। ऐसी परिस्थिति में किसी का भी धैर्य जवाब दे सकता है। लालच, हठ, राजनीतिक साजिश और पुत्रमोह की कीमत अब कांग्रेस पार्टी मध्य प्रदेश में चुकायेगी। वरिष्ठ नेताओं के पास न राज्य की सत्ता रहेगी और न ही बेटे को मंत्री बनाने का मौका। राहुल गांधी के करीबी के साथ कांग्रेस में ऐसा सौतेला व्यवहार किया जा सकता है तो आम कार्यकर्ता की औकात ही क्या? किसी को हद से ज्यादा दबाया जाएगा तो वो बागी हो ही जायेगा।

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कांग्रेस (Scindia Can Join BJP)  का शीर्ष नेतृत्व कितना बचकाना है ये इससे पता चलता है कि त्यागपत्र देने के बाद ज्योतिरादित्य को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। कांग्रेस के नेता सिंधिया को गद्दार, लालची, मौकापरस्त जैसे शब्दों से नवाज़ने लगें। लेकिन ये उनकी खीज ही है क्योंकि कांग्रेसी जानते है कि सिंधिया का कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल होना उनके लिए एक बहुत बड़ा झटका है। 15 साल बाद राज्य की सत्ता में वापसी करने वाली कांग्रेस ने अगले दशक के लिए फिर विपक्ष में बैठने की तैयारी कर ली है।

सिंधिया (Scindia Can Join BJP)  जैसा भारी-भरकम, कद्दावर कांग्रेसी अगर पार्टी छोड़ रहा है तो इसके मायने बहुत गहरे है। सबसे बड़ा सवाल उठता है कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की काबिलियत पर। जब प्रदेश में हाहाकार मचा था तब क्यों नही कमलनाथ, दिग्गी और सिंधिया को साथ बैठाकर उनके मतभेद सुलझा लिए गए? सिंधिया सिर्फ कांग्रेस के नेता नही बल्कि राहुल गांधी के मित्र भी थे। अपने मित्र के साथ लगातार हो रही बदसलूकी पर राहुल बाबा चुप क्यों थे? एक मित्र के नाते उन्होंने सिंधिया को सम्मान क्यों नही दिलाया? राहुल काबिल नेता नही है ये बात सब जानते है लेकिन वो एक अच्छे मित्र भी नही बन सके।

सिंधिया (Scindia Can Join BJP)  जैसा हैवीवेट युवा नेता अगर पार्टी में अपना भविष्य नही देख रहा है तो बाकी युवा नेताओं में भी इससे गलत संदेश जाएगा। कांग्रेस ने अपने युवा नेताओं को आगे बढ़ाने की बजाय हमेशा उनके पर कतरने का काम किया क्योंकि उन्हें डर लगता है कि ये नेता कहीं राहुल गांधी के लिए चुनौती न बन जाये। सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा जैसे युवा नेता पार्टी में इसीलिए हाशिये पर है क्योंकि ये युवा भी है और दुर्भाग्य से राहुल गांधी से ज्यादा काबिल भी।

कई कांग्रेसी सिंधिया (Scindia Can Join BJP) के भाजपा में जाने को सत्ता के लिये विचारधारा से समझौता बता रहे है। लेकिन ये नेता बड़े नादान है। ये भूल गए है कि सत्ता के लिए ही महाराष्ट्र में शिवसेना जैसी पार्टी के साथ हाथ मिलाने वाली कांग्रेस को विचारधारा की बातें करना शोभा नही देता। सिंधिया प्रकरण ने ये फिर साबित कर दिया है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व कितना खोखला और अविवेकी हो चुका है। मध्यप्रदेश की सत्ता जाना कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष के “मोदी रोको अभियान” की हवा निकाल देगा।

इस प्रकरण के दूरगामी परिणाम होंगे जो कांग्रेस की चूलें हिला देंगे। अब सचिन पायलट पर सबकी नजर टिकी है क्योंकि वो राजस्थान में कांग्रेस को मुश्किल में डाल सकतें है। बहरहाल, कांग्रेस के लिए ये मौका एक बार फिर आत्मावलोकन का है लेकिन साथ ही ये यकीन भी है कि वो ऐसा करेंगे नही। क्योंकि उन्हें सच्चाई दिखाई और सुनाई देना काफी पहले से बंद हो चुका है। भाजपा के प्रवक्ताओ को लंबे अरसे बाद मुस्कुराने का मौका सिंधिया ने जरूर दे दिया है। अब भाजपा बिहार में आत्मविश्वास से लबरेज़ होकर चुनाव लड़ेगी और विपक्ष एक मनोवैज्ञानिक दबाव के साथ। सिंधिया का कांग्रेस छोड़ना कांग्रेस के डूबते जहाज का एक महत्वपूर्ण अध्याय साबित होगा।

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Sachin Pauranik

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