भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अशुभ संकेत

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शेयर बाज़ार में अक्सर दो ट्रेंड चलते हैं, एक तेज़ी का और एक मंदी का। तेज़ी के ट्रेंड में लगातार कई दिनों तक बाज़ार में बढ़त रहती है और मंदी के दिनों में लगातार कई दिनों तक बाज़ार में गिरावट दर्ज की जाती है। ऐसा कुछ दिन होने के बाद ट्रेंड बदलता भी है, जिसे मार्केट की भाषा में ‘ट्रेंड रिवर्सल’ कहते हैं। इस ट्रेंड की यह खासियत होती है कि जब भी यह बदलता है तो मार्केट में भारी उठापठक होती है। ट्रेंड बदलने के साथ इसे पहचान लेना भी एक काबिलियत होती है क्योंकि शुरुआती दौर में ऐसा कर पाना बेहद कठिन होता है।

कल खबर आई कि स्विस बैंकों में 2017 में पिछले सालों की तुलना में तकरीबन 50% अधिक पैसा भारतीयों ने ज्यादा जमा करवा दिया है। इस खबर के सामने आते ही विपक्ष को बैठे-बिठाए मुद्दा मिल गया और मोदीजी के पुराने 15 लाख के वादे को लेकर उन्होंने सरकार को आड़े हाथों लिया। विपक्ष जहां इस मामले में सरकार पर हमलावर है वहीं सरकार कह रही है कि यह जानकारी सामने आना भी उनकी नीतियों की ही कामयाबी है। सरकार और भाजपा के प्रवक्ता अब कह रहे हैं कि विदेशी बैंकों में जमा सारी रकम काला धन नहीं है और इस पर बेवजह हंगामा किया जा रहा है, लेकिन इन सबके बीच असली सवाल है कि काले धन को देश में लाने का वादा आखिर किस बिनाह पर किया जा रहा था? मोदीजी ने एक नहीं बल्कि कई बार देश से बाहर जमा काले धन को देश में वापस लाने की प्रतिबद्धता ही नहीं जताई थी बल्कि यह कहने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी कि यदि पूरा काला धन वापस देश में ले  आएं तो देश के हर नागरिक को 15-20 लाख रुपए मुफ्त में ही मिल जाए।

इसके अतिरिक्त पतंजलि उत्पादों को देश-विदेश में बेचने वाले बाबा रामदेव भी देश में घूम-घूमकर विदेशों में जमा काले धन के बेहिसाब चमत्कारिक आंकड़े जनता को बताया करते थे, जिससे यह लगने लगा था कि देश की सभी समस्याओं के मूल में काला धन ही है और जिस दिन यह काला धन हिंदुस्तान वापस आ गया, देश गरीबी से तत्क्षण मुक्त हो जाएगा, लेकिन राष्ट्रवादी सरकार के 4 वर्ष पूर्ण होने पर अचानक हुए इस ‘ट्रेंड रिवर्सल’ से देश की जनता हैरान-परेशान है।

सभी सोच रहे हैं कि काले धन को लेकर किए गए सरकारी प्रयासों के बाद और नोटबंदी जैसे ऐतिहासिक कदम को उठाने के बाद भी यदि विदेशों में जमा काला धन बढ़ रहा है तो फिर हम किस दिशा में जा रहे हैं? 3 साल लगातार स्विस बैंकों में जमा पूंजी में गिरावट के बाद यदि इस साल 50% ज्यादा धन भारतीयों ने जमा करवा दिया है तो यह प्रतिशत वाकई में हैरान करने वाला है। 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ यदि ट्रेंड बदला है तो यह तय है कि आगे आने वाले सालों में भी विदेशी बैंकों में जमा पूंजी और बढ़ेगी। अब भाजपा प्रवक्ता कह रहे हैं कि विदेशी बैंकों में जमा सारा धन काला धन नहीं है, लेकिन तब उनसे पूछा जाना चाहिए कि 2014 के पहले तक विदेशी बैंकों में जमा पूरी पूंजी काला धन ही थी, यह तत्वज्ञान उन्हें कहां से मिला था?

कारोबारी संत बाबा रामदेव को भी स्पष्ट करना चाहिए कि अब काले धन को लेकर उनके ताज़ा विचार क्या है? बाबा को बताना चाहिए कि क्या अब काले धन को लेकर कोई आंदोलन करने का विचार उन्हें नहीं आता या फिर उन्होंने व्यापार बढ़ाने का ज्यादा जरूरी काम इस वक्त उनके पास है ? सरकार की एक के बाद एक विफलताएं सामने आती जा रही हैं, लेकिन कमजोर विपक्ष अपने ‘सी ग्रेड’ प्रवक्ताओं के सहारे सरकार को घेरने में पूरी तरह नाकाम साबित होता जा रहा है। विपक्ष के नौसिखिए प्रवक्ताओं से बेहतर कुछ टीवी एंकर सरकार से अच्छे सवाल पूछ लेते हैं, लेकिन लगता है जैसे बाबाजी ने अपना पूरा ध्यान आजकल व्यापार बढ़ाने की तरफ लगा लिया है वैसे ही विपक्ष ने भी 2019 चुनाव तक कैसे भी व्यर्थ के पचड़ों में पड़ने के बजाय एकजुटता बनाए रखने पर फोकस कर लिया है।

इसलिए अब न किसी को सवाल पूछने की फिक्र है और न जवाब देने की इसलिए विदेशी बैंकों में जमापूंजी के इस हालिया ट्रेंड रिवर्सल पर किसी का ज्यादा ध्यान ही नहीं है। सरकार के प्रयासों से 3 साल तक विदेशों में जमा पूंजी में कमी जरूर आई, लेकिन अब यदि उसमें फिर से बढ़ोतरी हो रही है तो इससे यही संकेत मिल रहे हैं कि शेयर मार्केट की तरह ही यहां अब ट्रेंड बदल रहा है। यह शुरुआती संकेत है, जो कह रहे हैं कि जो लोग विदेशी बैंकों में पैसे जमा करवाने में पहले घबरा रहे थे, अब पुनः निश्चिंत होकर पैसे जमा करवाने लगे हैं। ये संकेत एक भारी उठापठक की शुरुआत है, जिसे समझना जरूरी है। इसका मतलब यही है कि सरकार की लाख सख्ती के बाद भी विदेशों में जमा भारतीय पैसा बढ़ता ही जा रहा है। इस ट्रेंड का बदलना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है।

-सचिन पौराणिक

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