Talented View : जनता को केजरीवाल दे तो रिश्वत और मोदी दे तो तोहफा

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दिल्ली में भाजपा (BJP defeat In Delhi Assembly Elections 2020) की हार से ख़फ़ा मीडिया का एक धड़ा भारतीय राजनीति के इस कालखंड को “मुफ़्तकाल” कह रहा है। (Cartoon On Kejriwal) सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म्स पर भी दिल्ली की जनता को ‘मुफ्तखोर’ कहने वालों की बाढ़ आयी हुई है। लेकिन ऐसा कहना असल मे जनादेश का अपमान करना ही माना जायेगा। जनता को मतदान का लोकतांत्रिक अधिकार मिला हुआ है और वो इस अधिकार का इस्तेमाल अपने विवेक से करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है। माना की लोकतंत्र में कई खामियां हो सकती है लेकिन इसका ठीकरा जनता के सर तो बिल्कुल नही फोड़ा जा सकता। अब पुनः बात करतें है मुफ्तखोरी की। इस शब्द का क्या अर्थ हो सकता है? आज इस शब्द की विवेचना कर ही लेतें है और ये भी जान ही लेतें है कि दिल्ली (Cartoon On Kejriwal) की जनता को मुफ्तखोर कहने वाली पार्टियां और नेता खुद कितने पानी मे है? सबसे पहला तर्क ये की वो कह रहे है कुछ भी मुफ्त नही होता, उसकी कीमत जनता को ही चुकानी पड़ती है। मान लिया, तो फिर इस पर इतना हंगामा क्यों मचा हुआ है? जनता को जब इससे कोई तकलीफ नही है तो क्यों जबर्दस्ती उसे कोसा जा रहा है?

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और अगर मान भी लिया जाए कि फ्री बिजली, शिक्षा और पानी देना मुफ्तखोरी है (Cartoon On Kejriwal) तो प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि क्या है? उज्ज्वला योजना के मुफ्त कनेक्शन क्या है? अटल पेंशन योजना क्या है? पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस पर सब्सिडी क्या है? गरीबो को घर बनाने के लिए ढाई लाख रुपए देना क्या है? 1 रुपये किलो में गेंहू, 2 रुपये किलो में में चावल देना क्या है? मतलब आप कुछ योजना लाएं तो वो जनकल्याणकारी और दूसरा कोई ले आये तो मुफ्तखोरी? क्या मतलब है इसका? अब आतें है दिल्ली (Cartoon On Kejriwal) भाजपा के चुनावी घोषणापत्र पर। भाजपा ने साफ कहा था कि जो मुफ्त चला आ रहा है उसे हम बन्द नही करेंगे बल्कि और बढ़ाएंगे। लड़कियों को सायकल और स्कूटी भी मुफ्त देंगे। मनोज तिवारी ने खुलकर कहा कि हम केजरीवाल से भी ज्यादा चीजें दिल्ली को मुफ्त देंगे। इसका क्या मतलब था? आपके मुफ्त के माल के ऊपर दिल्ली की जनता ने केजरीवाल के मुफ्त के माल को तरजीह दे दी तो जनता मुफ्तखोर हो गयी? ये कैसी मुफ्तखोरी है कि भाजपा (BJP) दे तो जनकल्याण कहलाती है और दूसरा कोई दल दे तो कहा जाता है कि जनता को मुफ्तखोर बनाया जा रहा है?

प्रधानमंत्री का इंटरव्यू और चुनावी तीर

खैर, असली मुफ्तखोरी क्या होती है इसकी चर्चा भी आज कर ही लेतें है। असली मुफ्तखोरी (Cartoon On Kejriwal) ये है कि माननीय सांसदों को साल में 50 हजार यूनिट बिजली मुफ्त होती है, फ्री डेटा और फोनकॉल के ज़माने में सांसदों को हजारों रुपया टेलीफोन भत्ता दिया जाता है, संसद की कैंटीन में 2 रुपये, 5 रुपये में इन्हें बिरयानी खिलाई जाती है, अगर विधायक सांसद बनता है तो ये माननीय, विधायक पद की आजीवन पेंशन भी डकारते है और सांसद की भी। माननीयों को कोई इनकम टैक्स नही देना पड़ता साथ ही हर साल 34 हवाई यात्राएं भी मुफ्त मिलती है। करोड़ो कमानें वाले इन माननीयों के घर के पर्दे और सोफे के कवर तक सरकारी खर्च से धुलतें है। ये असली मुफ्तखोरी की एक बानगी भर है। इसके अलावा भी माननीयों को ऐसे ऐसे भत्ते और सुविधाएं मिलती है जो कल्पना से भी बाहर है। ऐसे सांसद अगर जनता को मुफ्तखोर कहें तो इन्हें बस यही कहा जा सकता है की एक बार आईने के सामने खड़े हो जाएँ बाकी आईना खुद बोल देगा कि असली मुफ्तखोर कौन है? और सबसे जरूरी बात ये की बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और बिजली-पानी कोई विलासिता की चीजें नही है। ये जनता की मूलभूत जरूरतें है। आम आदमी को घर चलाने में कितनी दिक्कतें आती है ये माननीय कभी समझ नही सकते। कोई राजनीतिक दल इसमें जनता को रियायत देता है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिये।

मुफ्तखोर (Cartoon On Kejriwal) देश की जनता नही बल्कि ये नेता है जो अपनी राजनीति चमकाने के लिये जनता पर ही आरोप लगाने में लगे हुए है। बेशर्म नेताओं को ये समझ जाना चाहिए कि जनता को मुफ्तखोर कहने का कोई हक इन्हें नही है। जनता को बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार दिलाना सरकारों की जिम्मेदारी होती है। ऐसा करके वो जनता पर कोई अहसान नही कर रहे है। बाकी मुफ्तखोर नेताओं को अब मेहनतकश और ईमानदार जनता का अपमान करना तुरन्त बन्द कर देना चाहिये। क्योंकि जनता ने अगर माननीयों की मुफ्तखोरी पर सवाल उठाने शुरू कर दिए तो नेताजी से जवाब देते नही बनेगा।

पीएम के इंटरव्यू पर भड़के नायडू

Sachin Pauranik

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