किस तरह मज़हब खतरे में…

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लखनऊ, एक शहर नहीं बल्कि एक कारवां। देश के सबसे बड़े सियासी सूबे की राजधानी। तहज़ीब और नज़ाकत का शहर, जिसे शिया नवाबों ने तहज़ीब का शहर बनाया इसलिए इसे ‘नवाबों का शहर’ भी कहा जाता है। इतिहास में और पीछे जाएं तो भगवान राम के समय से लखनऊ का अस्तित्व है। उस समय यह हिस्सा कौशल राज्य का ही हिस्सा था।

भगवान राम ने यह भूभाग अपने अनुज लक्ष्मण को दे दिया था इसलिए इसका नाम लक्ष्मणपुर पड़ा। समय के साथ लक्ष्मणपुर लखनऊ बन गया। अयोध्या से लगभग 135 किलोमीटर दूर बसा यह शहर आजकल लक्ष्मणजी की एक मूर्ति लगाने को लेकर विवादों में आ गया है।

दरअसल, मुद्दा यह है कि लखनऊ में एक मस्जिद है, जिसे टीले वाली मस्जिद कहा जाता है। कइयों का मानना है कि आज जहां यह मस्जिद है वहां पहले लक्ष्मण टीला ही था, जिसे बाद में मस्जिद का रूप दे दिया गया। फिलहाल मामला यह है कि इस मस्जिद के सामने एक पार्क है ‘टिकोनिया पार्क’, जो सरकारी भूमि पर बना हुआ है। अब इस पार्क में नगर निगम लक्ष्मणजी की एक मूर्ति लगाना चाहती है, लेकिन मस्जिद के मौलाना-मौलवी और मुस्लिम धर्मगुरु इस पर आपत्ति ले रहे हैं।

उनका कहना है की इस पार्क में जुमे की नमाज़ पढ़ी जाती है इसलिए मूर्ति नहीं लगाई जाए। कुछ दिन पहले जब रमज़ान का महीना चल रहा था, तब लखनऊ के ही एक अति प्राचीन शिव मंदिर मनकामेश्वर महादेव में वहां की महंत ने रोज़ा इफ़्तार पार्टी आयोजित की थी, जिसे गंगा-जमनी तहज़ीब की मिसाल माना गया था, लेकिन इस प्रकरण से कई सवाल खड़े होते हैं कि सार्वजनिक स्थानों पर कोई मूर्ति लगाने से एक मजहब की भावना आखिर क्यों आहत हो जाती है? लक्ष्मण की मूर्ति के सामने नमाज़ पढ़ने से आपत्ति है, लेकिन उनकी ही भूमि पर नमाज़ पढ़ना क्या सही है? और नमाज़ तो सड़कों पर और अन्य सार्वजनिक जगहों पर भी पढ़ी जा रही है तो क्या वहां भी किसी की मूर्ति नहीं लगा सकते? कई मुस्लिम हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर भी नमाज़ पढ़ते हैं तो क्या अब वहां भी कोई मूर्ति लगाने से पहले मुस्लिम समाज से अनापत्ति प्रमाण-पत्र लाना होगा?

ये बचकानी बातें आखिर कहां से शुरू होती हैं? तीन तलाक पर रोक हो चाहे सूर्य नमस्कार हो, वंदे मातरम कहने की बात हो चाहे देश को मजहब से ऊपर रखने की, सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के दौरान खड़े होना हो चाहे किसी की मूर्ति लगाना, ये बात-बात पर एक मज़हब खतरे में कैसे आ जाता है? सवाल ये भी है की जब आईएसआईएस के आतंकी एक मजहबी पंक्ति बोलकर बेगुनाहों के सिर कलम कर देते हैं, तब मजहब खतरे में नहीं आता? पूरी दुनिया में इस्लाम के नाम पर सबसे दुर्दांत आतंकी संगठन खड़ा कर लिया गया, तब मजहब खतरे में नहीं आता? अभी मंदसौर में दो अपराधियों ने एक बच्ची के साथ जो हैवानियत की, तब भी मज़हब खतरे में क्यों नहीं आया? यह फैसला कौन करता है कि किस बात पर मज़हब खतरे में आएगा और किस बात पर बच जाएगा?

सवाल भाजपा से भी पूछे जाने चाहिए कि जब अगले साल आम चुनाव है तभी आपको लक्ष्मणजी की मूर्ति, जामिया और एएमयू में दलित आरक्षण और जिन्ना की तस्वीर क्यों याद आ रही है? 4 साल में कुछ ठोस काम किया होता तो ये व्यर्थ के मुद्दे उठाने की जरूरत नहीं पड़ती। आज का बड़ा सवाल यही है कि आखिर क्यों हर छोटी-बड़ी बात को मजहबी चश्मे से देखा जाता है? मुस्लिम समाज यदि खुद आगे आकर लक्ष्मणजी की मूर्ति लगवाने की पहल करता तो क्या इससे गंगा-ज़मनी तहज़ीब कमजोर हो जाती? सोचने लायक बात है कि आखिर एक हाथ से ताली कब तक बजेगी?

-सचिन पौराणिक

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