जीतेजी सम्मान मुश्किल, मौत के बाद आसान…

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गाय का फोटो लगाकर उसकी पूजा करना और गोमाता की जय बोलना आसान है, लेकिन घर में गाय पालकर उसकी सेवा करना बहुत कठिन काम है क्योंकि फोटो वाली गाय न तो गोबर करती है न ही उसकी कोई सेवा की ज़रूरत होती है, न चारे-पानी की व्यवस्था करना होती है और न ही कोई देखभाल की ज़रूरत पड़ती है इसलिए शायद आजकल के फर्जी गोभक्त गाय पालने के बजाय गाय की रक्षा करने में ज्यादा यकीन करते हैं। बाकी पहले भी कह चुका हूं कि ये मॉडर्न कूल डूड किस्म के गोभक्त गोपालन तो दूर गाय, सांड, बैल और बछड़े में अंतर भी पता न कर पाएंगे। अटलबिहारी वाजपेयी के अस्थि कलश विसर्जन पर आजकल बवाल मचा हुआ है। विपक्ष के नेता कह रहे हैं कि जीते जी अटलबिहारी वाजपेयी को पार्टी के पोस्टर से भी गायब कर दिया गया, लेकिन मरने के बाद उनकी अस्थियों को दिखाकर वोट मांगे जा रहे हैं।

वैसे बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि राजीव गांधी का अस्थि विसर्जन भी इसी प्रकार का किया गया था। यह बात दीगर है कि बम ब्लास्ट में उनकी नश्वर देह का कोई भी भाग सलामत नहीं रह पाया था।  खैर मुद्दा यह है कि समाजवादी पार्टी के पूर्व मुखिया मुलायमसिंह यादव बेहद परेशान नज़र आ रहे हैं। उनका कहना है कि अब उनका कोई सम्मान नहीं करता है, शायद मरने के बाद लोग ऐसा करें। मुलायम के मुताबिक, राममनोहर लोहिया की भी यही परेशानी थी कि जीते-जी उन्हें भी सम्मान नहीं मिला, लेकिन आज उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। मुलायम को सम्मान न मिलने की वजह मानी जा रही है उनके सुपुत्र अखिलेश यादव, जो इन दिनों पार्टी की कमान अपने हाथ में ले रखे हैं। उनके चाचा शिवपाल की भी यही पीड़ा है कि उन्हें भी कोई पूछता नहीं है। भारत की राजनीति में इस तरह की बातें नई नहीं है। एक उम्र के बाद क़द्दावर नेताओं को हाशिये पर धकेलने की परंपरा हर पार्टी में रही है।

कांग्रेस ने लालबहादुर शास्त्री और नरसिंहराव जैसे नेताओं को भुला दिया तो भाजपा ने आडवाणी, जोशी जैसे नेताओं को। इनके अलावा जॉर्ज फर्नांडीज, बाला साहब और कांशीराम जैसे नेता भी अपने अंतिम दिनों में सक्रिय राजनीति में अनदेखी का शिकार बन चुके हैं, लेकिन कुछ नेताओं को मरने के बाद सम्मान मिलता है तो कुछ को वो भी नसीब नहीं होता। जैसे अटलबिहारी वाजपेयी जी को मरणोपरांत देश ने अभूतपूर्व श्रद्धांजलि दी तो नरसिंहराव की पार्थिव देह को अंतिम दर्शन के लिए भी पार्टी मुख्यालय में जगह नहीं मिली।

खैर, बात का लब्बोलुआब यही है कि जिस प्रकार जिंदा गाय की सेवा मुश्किल होती है और फोटो लगाकर ‘गोमाता की जय’ बोलना बेहद आसान होता है, वैसे ही राजनीति में अपने बुजुर्ग नेताओं का जीतेजी सम्मान करना बहुत मुश्किल हो जाता है जबकि मरने के बाद उनके नाम पर स्मारक बनाना, जय-जयकार करना और तस्वीर के आगे शीश झुकाना बहुत आसान काम है। क्योंकि मरा हुआ नेता कुछ गलत होने पर उन्हें हड़काएगा नहीं, उनकी आलोचना नहीं कर पाएगा इसलिए मरे हुए नेता वर्तमान नेताओं सहित विपक्ष को भी अत्यधिक प्रिय प्रतीत होते हैं। मुलायम यादव की फिक्र वाजिब है। उनकी ही खड़ी की हुई पार्टी में उनका सम्मान नहीं होना राजनीति में शुभ संकेत नहीं है। मुलायम जैसी हिम्मत बहुत कम नेता कर पाते हैं, जो अपने असम्मान को भी सार्वजनिक कर दे। बाकी बुजुर्ग नेताओं को भी मुलायम से प्रेरणा लेकर अपने साथ हो रही अवहेलना पर खुलकर बोलना चाहिए। जनता को पता चलना चाहिए कि राजनीतिक पार्टियों में बुजुर्ग नेताओं के साथ आखिर चल क्या रहा है?

-सचिन पौराणिक

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