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Talented View:कपटी चरित्र छुपता नहीं छुपाने से

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कहते हैं इंसान का असली स्वभाव ज्यादा समय तक छुपाया नहीं जा सकता। कपट का आवरण थोड़े समय के लिए ज़रूर ओढ़ा जा सकता है, लेकिन उसके बाद असली चरित्र सामने आ ही जाता है। लोकतंत्र में जनता यह सालों से देखती आ रही है कि किस तरह नेता उनके सामने अपनी आदर्श छवि प्रस्तुत करते हैं, लेकिन एक बार चुनाव खत्म होते ही उनका असली चेहरा सामने आ जाता है क्योंकि नैतिकता और आदर्श रूप का उनका यह चेहरा असली नहीं होता है। यह सिर्फ दिखावे का आवरण होता है, जिसे ज्यादा समय तक पहना भी नहीं जा सकता।

आवरण के हटते ही उनका जो चेहरा सामने आता है, वह बेहद कुरूप होता है। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव का दौर जारी है। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में मतदान हो चुका तो राजस्थान में आज मतदान हो रहा है, लेकिन भागदौड़ भरी जिंदगी में आजकल नेता अपना असली रंग दिखाने में चुनाव होने तक का भी सब्र नहीं रख पा रहे हैं। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में नेताओं की आपसी खींचतान में भाषाई मर्यादा फिर भी उतनी नहीं गिरी, लेकिन राजस्थान चुनाव में जिस तरह की भाषा का प्रयोग नेताओं ने किया है, उससे लोकतंत्र में कुछ स्थायी दाग लग चुके हैं।

सिद्धू हो, रागिनी नायक हो, सम्बित पात्रा हो चाहे शरद यादव। सभी नेताओं ने नैतिकता की तय सीमाओं से बहुत नीचे उतरकर अपनी पार्टी का प्रचार किया है। एक टीवी शो के दौरान कांग्रेस की रागिनी नायक और भाजपा के गौरव भाटिया के बीच जो संवाद हुआ, उसे सुनकर कोई विश्वास नहीं कर सकता कि ये किसी राष्ट्रीय पार्टी के प्रवक्ता हैं। रागिनी ने पहले प्रधानमंत्री को चोर कहा, इस पर भाटिया ने राहुल गांधी को चपरासी कहा, लेकिन इसके बाद रागिनी ने जो कहा, उसे यहां लिखा भी नहीं जा सकता है। रागिनी गुस्से में अपशब्द कहते हुए स्टेज से नीचे उतर गईं और शो वहीं स्थगित करना पड़ गया।

इसके अलावा शरद यादव ने भी मुख्यमंत्री वसुंधराराजे के शरीर को लेकर ऐसी टिप्पणियां की, जिसे बिल्कुल नहीं सहा जा सकता है।  भाजपा नेताओं के एक परिवार को लेकर हमलों और सिद्धू ने जो भाषा योगी आदित्यनाथ के लिए इस्तेमाल की, वह भी अभद्रता की श्रेणी में ही रखी जाएगी। चुनाव लोकतंत्र में आते हैं, जाते हैं, लेकिन ऐसी भाषा का प्रयोग राजनीति पर हमेशा के लिए धब्बा लगा देती है। राजनीति में आने के बाद आक्षेपों से बचना मुश्किल है, लेकिन जिनका राजनीति से कोई वास्ता भी नहीं उन्हें भी आरोप-प्रत्यारोप में घसीटना कतई जायज़ नहीं है।

किसी के परिवार और मां-बाप पर भी यदि टिप्पणियां की जाएंगी तो फिर भाषाई मर्यादा कैसे अक्षुण्ण रह पाएगी? सवाल है कि चुनाव जीतने के लिए क्या भाषा का स्तर गिराना ज़रूरी है? पार्टी का शीर्ष नेतृत्व बिगड़े बोल वाले नेताओं पर कार्रवाई क्यों नहीं करता? क्या जनता को ऐसे नेताओं को सबक नहीं सिखाना चाहिए? आखिर क्या वजह है कि व्यक्तिगत हमलों को लेकर हम इतने सहिष्णु हो चले हैं? राजनीति का गिरता स्तर क्या लोकतंत्र को खतरे में नहीं डालेगा? नेताओं के मन में जनता का डर क्या समाप्त हो गया है? चुनाव आयोग और बाकी संस्थाएं क्यों मूकदर्शक बनकर यह सब देख रहे हैं?

क्या ऐसा कानून नहीं बनाया जाना चाहिए, जिससे सार्वजनिक जीवन में भाषा का स्तर बना रहे? लोकतंत्र में असली मालिक जनता होती है। आज राजस्थान में मतदान चल रहा है। अब यह जनता को देखना है कि इन गालीबाज़ और बदज़ुबान नेताओं का क्या करना है? जनता यदि इन्हें सबक सिखा देती है तो इन्हें भाषाई मर्यादा के मायने तुरन्त समझ आ जाएंगे। राजस्थान की जनता इस बार गालीबाज नेताओं को सबक सिखाने के लिए मतदान करे। लोकतंत्र के इस यज्ञ में राजस्थान की जनता अपनी आहुति ज़रूर डाले, यही निवेदन है।

– सचिन पौराणिक

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