सरकार दे सख्त संदेश

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यदि कोई नीम-हकीम कहीं लोगों का इलाज करे और सवाल पूछने पर कहे कि असली डॉक्टरों की तादाद कम है और मरीज़ ज्यादा है इसलिए हम तो डॉक्टरों की मदद कर रहे हैं तब? कोई नकली खाद्य अधिकारी बनकर दुकानों पर छापा मारे, पैसे वसूले और पकड़ाने पर कहे कि जिले में जनसंख्या के हिसाब से खाद्य अधिकारियों की अत्यंत कमी है इसलिए हम अधिकारियों की मदद कर रहे हैं तब?

कोई फ़र्जी टीसी बनकर ट्रेन में यात्रियों की चेकिंग करे, उनसे उगाही करे और पकड़ाने पर कहे कि ट्रेन में भीड़ ज्यादा है और रेलवे का स्टाफ कम है इसलिए हम रेलवे की मदद रहे थे तब? कोई फ़र्जी पुलिस अधिकारी बनकर व्यापारियों से अवैध वसूली करे और पकड़ाने पर कहे कि पुलिस बल की कमी की वजह से वो ये काम कर रहा है तब?

गैर-कानूनी काम करने वालों ऐसी दलीलें सुनकर आपको हंसी आ सकती है लेकिन ऐसा इस देश में ही होता है।एआईएमपीएलबी यानी ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने देशभर के हर ज़िले में शरिया अदालते खोलने की योजना बनाई है। हालांकि बोर्ड के अध्यक्ष जफरयाब गिलानी ने सफाई देते हुए कहा की हम इसे शरिया अदालत नहीं कहते लेकिन ये दारुल क़ज़ा है। इसमे काजी लौगो के वैवाहिक एवं अन्य झगड़े सुलझायेंगे।

लेकिन बड़ा सवाल ये है कि यदि  शरिया के हिसाब से मुस्लिमों को शादी व अन्य मसलों पर न्याय चाहिए तो अपराध के मामलों में भी उन्हें शरिया के हिसाब से ही सज़ा भी मिलना चाहिए। अपनी सुविधा के हिसाब से शादी, तीन तलाक, हलाला, बीवी और बच्चों के विषय में शरिया कानून की मांग करना और बाकी मामलों में भारतीय दंड विधा के हिसाब से चलना आखिर दोहरा रवैया नहीं तो क्या है? सऊदी जैसे देश मे चोरी करने पर हाथ हाथ काटने और बलात्कार के अपराधियों का सरेआम कर कलम किया जाता है या फिर उनका लिंग काट लिया जाता है। लेकिन कोई भी मुस्लिम संस्था शरिया के हिसाब से अपराधियों को सज़ा देने की वकालत कभी नहीं करती। खाप पंचायतों का मुखर होकर विरोध करने वालों को भी शरिया अदालत जैसे मुद्दे पर कुछ बोलते नहीं बन रहा है जबकि खाप पंचायत का जितना विरोध होता है उससे दस गुना ज्यादा विरोध शरिया अदालतों का होना चाहिए क्योंकि पहली बात की ये देश की न्याय व्यवस्था का निर्लज्ज उपहास है और दूसरी की खाप पंचायत देश के बहुत कम हिस्से में प्रभावशील है जबकि शरिया अदालत देशभर में खोलने की योजना है।

शारिया अदालत के पक्ष में ये दलील दी जा रही है की भारत की कोर्ट में लाखों मुकदमें लंबित है इसलिए हम इन अदालतों के द्वारा उनका बोझ कम करने की कोशिश कर रहे है। ये दलील सुनते ही उपरोक्त वर्णित तमाम उदाहरण जेहन में आ जाते है और ये सोचने पर मजबूर होना पड़ता है की अब ऐसी दलीलों से कैसे निपटा जाए? संसाधनों की कमी हर जगह ही है तो क्या एआईएमपीएलबी शरिया अदालत के बाद पुलिस, वकील, डॉक्टर, बैंक और रेलवे स्टाफ भी शरिया के हिसाब से बनाने शुरू कर देंगे? क्या ग्यारंटी है की ऐसे संगठन कल को देश में सैनिकों की कमी का हवाला देकर खुद की शरिया फ़ौज बनाने की मांग नहीं करने लगेंगे? संवैधानिक संस्थाओं के अतिरिक्त किसी भी प्रकार की अन्य समानांतर संस्थाएं खड़ी करने का हक इस देश मे किसी को नहीं दिया जाना चाहिए चाहे वो कोई भी धर्म-मजहब को मानने वाला हो। ऐसे खतरनाक मंसूबो पर सरकार को सख्त संदेश देना चाहिए जिससे अगली बार कोई ऐसा करने की सोच भी ना सके।

-सचिन पौराणिक

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