गिरती संवेदनाएं, बढ़ता जनाक्रोश 

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एक हिन्दी फिल्म का संवाद है, “यदि हम पुलिस वाले ठान लें तो अपराध तो दूर कोई मंदिर के बाहर से चप्पल भी नहीं चुरा सकता।” यह बात आज के समाज पर बिल्कुल फिट बैठती है। पुलिस को सब पता होता है कि शहर की किस गली में, किस कोने में और कहां कोई गलत हरकत चल रही है, लेकिन कार्रवाई करने की जगह पुलिस अपना कमीशन लेकर आंखें मूंदे रहती है। पुलिस के पास यदि दो पक्ष कोई शिकायत लेकर जाते हैं तो पुलिस का कर्तव्य होता है जांचने का कि कौन सही है और कौन गलत। पुलिस इस दिशा में दिमाग लगाती है कि दोनों पक्षों में कौन ज्यादा पैसे वाला है और किससे ज्यादा उगाही की गुंजाइश बनती है? पुलिस का ध्यान सही-गलत निर्धारित करने में कम और पैसे वसूलने में ज्यादा चलता है।

हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी के बीच कुछ खबरें ऐसी सुनने में आ जाती हैं, जो हमारी मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख देती है और यह सोचने के लिए विवश कर देती है कि हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है? इंदौर में जो 4 महीने की बच्ची से हैवानियत की घटना हुई है, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया है। चार माह की फूल जैसी कोमल बच्ची को छूने में भी डर लगता है कि कहीं उसे नुकसान न पहुंच जाए, लेकिन हमारे बीच ऐसे राक्षस भी हैं, जिन्हें उस बच्ची में भी हवस दिखाई पड़ गई। किस विकृत मानसिकता और घृणित मनोदशा के लोग हैं ये जो इंसानियत को शर्मसार करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। रोज़ अखबार भरे रहते हैं दुष्कर्म की घटनाओं से, जिनमें कभी 5 साल तो कभी 3 साल और अब 4 महीने की अबोध बच्चियों को हवस का शिकार बनाया जा रहा है। ऐसा लगता है मानो कोई प्रतियोगिता चल रही हो कि कौन कितना नीचे गिर सकता है?

इंदौर की घटना पर पुलिस का जो रवैया सामने आ रहा है, वह महिलाओं की चिंता और बढ़ाने वाला है। यह घटना वहां हुई, जहां से पुलिस थाना महज 2 मिनट की दूरी पर है। उसके बाद भी पुलिस अधिकारियों को वहां पहुंचने में घंटों लग गए। पुलिस अपने स्तर पर ऐसे अपराधियों से निपटने में पूर्णतः सक्षम है, कोई कानून उन्हें रोक नहीं सकता, लेकिन बात आखिर प्राथमिकता की आ जाती है।

निरंतर हो रही इन घटनाओं से दुखी सरकार अब पॉक्सो कानून में बदलाव कर रही है, जिससे 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से दुष्कर्म करने वालों को फांसी की सजा दी जा सकेगी। सवाल यह है कि सरकार अब तक क्यों सोई हुई थी? बलात्कारियों को कठोर सजा देने से, फास्टट्रैक कोर्ट में मामला चलाने से अब तक किसी ने रोका था क्या आपको? अब अगले साल चुनाव है तो बच्चियों की फिक्र का ढोंग शुरू कर दिया। क्या जनता को बेवकूफ समझ रखा है?

एक हमारे मुख्यमंत्री शिवराज मामाजी हैं जो कह रहे हैं महिलाएं छेड़छाड़ करने वालों को मारें, उनका जुलूस निकालें, लेकिन मामाजी सब काम महिलाओं को ही करना है तो आप किसलिए हैं फिर? अब 4 महीने की मासूम कैसे अपनी रक्षा करेगी बताइये जरा। इतना निकृष्टतम कार्य करने वाला निश्चय ही किसी नशे में होगा। 4 महीने की बच्ची से दुष्कर्म कोई होशोहवास में नहीं कर सकता, लेकिन मामाजी नशे पर प्रतिबंध लगाएंगे नहीं। समस्या की जड़ पर वार मामाजी को करना नहीं है, सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करना है। लाड़ली लक्ष्मी और कन्यादान जैसी योजनाएं तभी सफल कहलाएगी, जब समाज नशामुक्त बनेगा।

यदि अपराधियों को मानवता नहीं समझ आ रही तो हमने भी कोई ठेका नहीं ले रखा है मानवता का। अब ये जरूरी हो गया है कि ऐसे अपराधियों को सार्वजनिक मंच पर सजा दी जाए, जिससे समाज में सख्त संदेश जाए। मासूम बच्चियों से बलात्कार करने वालों से उनकी मर्दानगी छीन ली जाए या फिर सीधे फांसी दी जाए। सार्वजनिक तौर पर यह संभव नहीं हो सके तो सजा के वीडियो बनाकर वायरल किए जाएं, जिससे बाकी अपराधियों के मन में भय व्याप्त हो और बच्चियां सुरक्षित महसूस कर सके।

पुलिस को भी अब अपनी प्राथमिकताएं निर्धारित करने की जरूरत है। जहां बात मानवीय संवदेनाओं की हो, कम से कम तब तो ईमानदारी से अपना कर्तव्य उन्हें निभाना ही चाहिए। सरकार को भी ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे ऐसे घृणित अपराधों में फांसी की सजा जल्द से जल्द सुनाई जा सके। जनता में दुष्कर्म की घटनाओं को लेकर गुस्सा बढ़ता जा रहा है। यदि ऐसे में कानून और व्यवस्था अपना काम ठीक से नहीं करेगी तो जनता के गुस्से को रोक पाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। यह बढ़ता जनाक्रोश एक चेतावनी है सरकार और व्यवस्था के लिए कि सुधर जाओ नहीं तो जनता खुद भी न्याय करना जानती है।

-सचिन पौराणिक

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