हाथी पर बैठोगे तो भी कुत्ता काट लेगा..!

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सुबह 9 से 11 बजे के बीच सारे कार्यालय खुल जाते हैं और यहां काम करने वाले सभी कर्मचारी या तो हेवी नाश्ता करके या फिर खाना खाकर ही घर से निकलते हैं क्योंकि ऑफिस का दिन कितना व्यस्त होगा, भोजन करने का समय मिल पाएगा भी या नहीं, कुछ कह नहीं सकते। समय मिला भी तो भी 3 बजे के लगभग या फिर रात को घर आने के बाद ही खाना नसीब होता है, लेकिन पहली बार खाने से लेकर दूसरी बार खाने के बीच के ये 4-5 घंटे उपवास जैसा पावन कार्य भी कहला सकते हैं| यह बात कल दिल्ली कांग्रेस के नेताओं ने देश को समझाई।

कहते हैं, जब आपकी किस्मत अच्छी न हो, तब यदि आप हाथी पर भी बैठेंगे तो भी आपको कुत्ता काट लेगा।

ऐसा ही कुछ कल दिल्ली में देखने को मिला। दलितों के खिलाफ देशभर (विशेषकर भाजपा शासित राज्यों) में हो रही हिंसा के खिलाफ कांग्रेस ने उपवास का आयोजन किया था, लेकिन उपवास में शामिल नेताओं की सुबह दबाकर छोले-भटूरे खाने की तस्वीरें सामने आते ही कांग्रेस में खलबली मच गई और एक नई शब्दावली ‘सांकेतिक उपवास’ की रचना करके कांग्रेस सफाई देने की कोशिश कर रही है। वैसे ‘सांकेतिक धरना’ सुना था, ‘सांकेतिक हड़ताल’ सुना था, ‘सांकेतिक विरोध’ भी सुना था, लेकिन ‘सांकेतिक उपवास’ एक अलग ही शब्द कांग्रेस ने कल ईजाद कर लिया। वैसे भरपेट छोले-भटूरे खाने के बाद कुछ घंटे वैसे ही भूख नहीं लगती इसलिए ये कुछ घंटे दलितों के बहाने सरकार को कोस लेंगे और दलितों को मूर्ख भी बना लेंगे, शायद यही कांग्रेस नेताओं ने सोचा होगा।

खराब किस्मत के कारण किसी ने ‘चैनाराम हलवाई’ के यहां छोले-भटूरे खाते कांग्रेसियों की तस्वीरें भाजपा नेता हरीश खुराना तक पहुंचा दी। जैसे ही खुराना ने ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर डाली कांग्रेस की हालत पतली हो गई। कांग्रेसियों को पता था कि तस्वीरें असली है इसलिए कांग्रेस ने कांग्रेस से भाजपा और भाजपा से फिर कांग्रेस में आए अरविंदरसिंह लवली को सफाई देने के लिए आगे किया। सफाई देते हुए लवली ने कहा कि यह सिर्फ सांकेतिक उपवास था, जो 10.30 बजे शुरू होना था और ये तस्वीरें सुबह 8 बजे की है इसलिए इसमें कुछ भी गलत नहीं है। हालांकि यह बात दीगर है कि चैनाराम हलवाई का कहना है कि उनकी दुकान ही 9 बजे खुलती है।

जनता यह जानना चाह रही है कि इस उपवास का अर्थ क्या है? छोले भटूरे खाकर घर से आओ फिर जनता के सामने कुछ घंटे उपवास रखो और फिर यहां से छुट्टी होते ही फिर किसी हलवाई के यहां छोले कुलचे खाते हुए घर निकल जाओ| क्या यही उपवास होता है?जनता के सामने बस कुछ नहीं खाने भर से ही उपवास हो जाता है? जनता के सामने कुछ खा नहीं सकते, बस डकारें ले सकते हैं, यह कैसा उपवास है?

कहां तो कांग्रेस नेता भाजपा को दलितों के मुद्दे पर घेरने निकले थे और दिन होते-होते खुद ही छोले भटूरे के उपवास पर अपनी भद पिटवा बैठे। राहुल गांधी खुद इस उपवास में शामिल होने 1 बजे पहुंचे| क्या पता वे खुद घर से लंच लेकर आए हों, तभी इतनी देर हो गई। यह घटनाक्रम यह दर्शाने के लिए काफी है कि कांग्रेस को असलियत में दलितों की कितनी परवाह है और उनके नेता राजनीति को कितनी गंभीरता से लेते हैं। राहुल गांधी अपनी ‘पार्टटाइम राजनीति’ की सोच से अब भी उबर नहीं पा रहे हैं| वे सोचते हैं कि ऐसे ढोंग से दलित वोट उनकी झोली में आ जाएंगे तो उनकी सोच बचपने वाली ही कही जाएगी। विरोधी तो कह ही रहे हैं कि यह ‘उपवास’ नहीं बल्कि दलितों का ‘उपहास’ है।

खैर, मेरे जैसे इन्सान और कर्मचारी वर्ग, जो कभी कोई उपवास नहीं रख पाते हैं, हमें जरूर इस “सांकेतिक उपवास” नाम के शब्द से थोड़ा नैतिक बल मिला है। अब हम जैसे भी छाती ठोककर सबसे कह सकते हैं कि ऐसा कांग्रेस वाला उपवास हम रोज़ ही रखते हैं। कांग्रेस के विरोधी चाहे उन्हें भ्रष्टाचार की जननी बताते हो, लेकिन हम तो उन्हें ऐसे शब्द का जनक बताएंगे, जिन्होंने उपवास की परिभाषा ही बदलकर रख दी।

अब चलते हैं, मुझे भी थोड़ी भूख लगने लगी है क्योंकि मेरे उपवास को शुरू हुए घंटे बीत चुके हैं। छोले भटूरे खाकर मुझे भी अगले कुछ घंटों के उपवास के लिए फिर तैयार होना है।

-सचिन पौराणिक

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