लोकतंत्र की हत्या की कोशिश करते दुश्मन

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श्रीलंका में जब गृहयुद्ध चल रहा था तब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने द्वीप पर शांति स्थापित करने के लिए सेना भेजी। उनकी नीयत यही थी कि भारत को अपने पड़ोसी देशों की मदद करनी चाहिए, लेकिन श्रीलंका में सेना भेजने की वजह से उन्हें तमिलों के साथ ही श्रीलंका के विद्रोहियों का गुस्सा भी झेलना पड़ा। इसी वजह से अगले चुनाव में दक्षिण भारत में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नही रहा और कांग्रेस चुनाव हार गई।

राजीव गांधी इस हार से व्यथीत थे और उन्हें लगा जनता से दूरी इस हार की बड़ी वजह है इसलिए उन्होंने 1991 के चुनाव से पहले जनता से सीधा संपर्क प्रारम्भ कर दिया। हर रैली में वे सुरक्षा घेरा तोड़कर जनता से मिलने लगे थे और उनके सुरक्षा अधिकारी उनके इस रवैये से बेहद चिंतित थे। जनता के बीच जाने से उनकी लोकप्रियता फिर से बढ़ने लगी और ऐसा लगने लगा था कि अगला चुनाव राजीव गांधी शत प्रतिशत जीतेंगे, लेकिन श्रीलंका में विद्रोही गुट के नेता प्रभाकरण, राजीव की फिर से बढ़ती लोकप्रियता से घबरा रहे थे। उनको ये डर था कि अगर वो दोबारा प्रधानमंत्री बनते हैं तो श्रीलंका में शांति स्थापित करने के प्रयासों में तेज़ी आ जाएगी जो विद्रोही नहीं चाहते थे।

प्रभाकरण ने एक फिदायीन दस्ता बनाकर राजीव गांधी को बम से उड़ाने की साजिश रची, जिसमें ऐसे विस्फोटक का इस्तेमाल किया गया जो मेटल डिटेक्टर की पकड़ में नही आता था। कई विदेशी ताकतें भी इस साजिश में शामिल थी, जिनकी मदद हमारी ही खुफिया एजेंसियों के कुछ बेईमान अफसर कर रहे थे। आज की युवा पीढ़ी राजीव गांधी की हत्या की इस अध्याय से ज्यादा वाकिफ़ नहीं है, इसलिए एक बार उन्हें जॉन अब्राहम की फ़िल्म ‘मद्रास कैफे’ जरूर देखना चाहिए।

इस फ़िल्म में लिट्टे, विद्रोही, खुफिया एजेंसियों के अधिकारी और उस दौर की हर घटना को जीवंत अंदाज़ में दिखाया गया है। फ़िल्म में जॉन एक रॉ एजेंट होते हैं, जिन्हें खूफिया मिशन पर श्रीलंका भेजा जाता है। फ़िल्म की कहानी उन वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है, जिससे भारत की राजनीति हमेशा के लिये बदल गई। फ़िल्म में दिखाया गया है कि कैसे भारत चारों तरफ से दुश्मनों से घिरा हुआ है और कोई प्रधानमंत्री अगर अच्छा काम करता है तो दुनिया की सारी ताकतें उन्हें खत्म करने में लग जाती हैं।

ये बातें आज इसलिए याद आ रही हैं क्योंकि भीमा-कोरेगांव हिंसा के एक आरोपी के घर से बरामद चिट्ठी में राजीव गांधी की तर्ज़ पर ही नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश का खुलासा हुआ है। एक प्रधानमंत्री की हत्या का दर्द क्या होता है ये भारत से ज्यादा बेहतर दुनिया का कोई मुल्क नही समझ सकता। पहले लालबहादुर शास्त्री, फिर इंदिरा गांधी और उनके बाद राजीव गांधी की हत्या ने देश के विकास को मीलों पीछे पहुंचा दिया था। आज भारत दुनिया में एक बार फिर सीना ठोंककर खड़ा है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने 4 सालों में न सिर्फ घरेलू मोर्चे पर बल्कि विदेशों में भी भारत के तिरंगे का मान बढ़ाया है।

नरेंद्र मोदी को दुनिया मे मिल रही इज्जत देश के दुश्मनों को कभी बर्दाश्त नही हो सकती इसलिए वे हर उस ताकत का समर्थन करेंगे जो मोदी को हटाने में मदद कर सके। नक्सलियों पर इस ताज़ा खुलासे ने न सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों बल्कि दुनियाभर के बुद्धिजीवियों और मोदीजी के चाहने वालों के कान खड़े कर दिए हैं। भारत आज विश्व की उभरती हुई महाशक्ति बन रहा है और ऐसे समय मे ऐसी किसी भी साजिश करने वालों से निर्दयता से निपटने की जरूरत है। नरेंद्र मोदी आज देश की जरूरत है इसमें कोई संशय नही है।

लेकिन ऐसे संवेदनशील मसले पर भी नेताओं के बयान सुनकर शर्म आती है कि क्या राजनीति के लिये और कोई मुद्दा नही बचा है। विपक्ष के पास? आतंकवादियों और नक्सलियों द्वारा देश के प्रधानमंत्री को मारने की साजिश के बीच ऐसी नीच राजनीति क्या लोकतंत्र के स्तर को रसातल में नही ले जा रही है? राजनीतिक मतभेद अपनी जगह है लेकिन प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर भी राजनीतिक बयानबाज़ी लोकतंत्र के लिये बड़ा खतरा है।

–  सचिन पौराणिक

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