इफ़्तार पार्टी जैसे गंगा में डुबकी..?

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दिल्ली के एक युवा अंकित सक्सेना की महज कुछ महीनों पहले सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गई थी क्योंकि उसने एक मुस्लिम लड़की से प्यार किया था। उसे लगा था भाईचारे और गंगा-जमुनी तहज़ीब की बातें करने वाले उसका साथ देंगे, लेकिन लड़की के घरवालों ने ही बीच सड़क पर गला रेतकर उसकी नृशंस हत्या कर दी थी। एक हिन्दू होकर मुस्लिम लड़की से प्यार करने के गुनाह की ऐसी सज़ा देखकर दिल्ली दंग रह गई थी, लेकिन पश्चिमी दिल्ली के रघुबीर नगर में उसी अंकित सक्सेना के पिता ने कल इफ़्तार पार्टी का आयोजन किया। अंकित के पिता के आर्थिक हालत इस समय ठीक नहीं है, लेकिन फिर भी जिस तरह उन्होंने इफ़्तार पार्टी का आयोजन किया, वह कई सवाल छोड़ जाता है।

रमज़ान का पाक महीना चल रहा है और सभी रोजेदार इस समय इबादत में व्यस्त हैं। मुस्लिमों में सबसे पवित्र माने जाने वाले इस महीने में केंद्र की हिन्दू राष्ट्रवादी सरकार भी अपनी छवि बदलने के लिए एक तरफ कश्मीर में संघर्षविराम का पालन कर रही है तो दूसरी ओर रेलवे मुस्लिम कर्मचारियों को रोज़े खोलने के लिए जल्दी छुट्टी दे रही है। इसके अलावा देश के तमाम राजनीतिक दलों के नेता गोल टोपी पहनकर अपने स्तर पर इफ़्तार पार्टियों के आयोजन में व्यस्त हैं। आज हालात ऐसे हैं कि देश में ऐसी कोई राजनीतिक पार्टी खोजना मुश्किल है, जिसने रोज़ा इफ़्तार पार्टी न रखी हो।

देश के संविधान में लिखे एक शब्द ‘धर्मनिरपेक्ष’ यानी कि सेक्युलरिज़्म की इस वक्त देश में ऐसी परिभाषा गढ़ दी गई है, जिससे देश की सामाजिक समरसता और अखंडता ही खतरे में आ चुकी है। देश में ऐसा माहौल बना दिया गया है कि जिस दल के नेता गोल टोपी पहनकर इफ़्तार पार्टी न दे, वे दल धर्मनिरपेक्ष ही नहीं है। रोज़ा इफ़्तार पार्टी का आयोजन करना गलत नहीं है, लेकिन इसका आयोजन न करना और इसमें शामिल न होना भी कोई गुनाह नहीं है। अपने धर्म-मजहब का पालन करना व्यक्तिगत बात है, लेकिन यहां भी राजनीति होना धर्म निरपेक्षता का नहीं बल्कि साम्प्रदायिकता का उदाहरण समझा जाना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी को भी रमज़ान में मुंशी प्रेमचंद की कहानी का पात्र हामिद और उसका चिमटा याद आ जाता है तो आरएसएस से जुड़े ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ ने भी कल मुम्बई के सरकारी गेस्ट हाउस ‘सहयाद्रि’ पर इफ़्तार पार्टी का आयोजन कर बवाल मचा दिया। आरएसएस की इफ़्तार पार्टी का कई मुस्लिम संगठनों ने यह कहकर विरोध जताया कि यह संघ की केवल मुस्लिम वोटरों को 2019 के चुनाव के लिए रिझाने की साजिश है। यह पाखंड के अलावा कुछ नहीं है, लेकिन सवाल है कि यदि संघ की इफ़्तार पार्टी पाखंड है तो बाकी दलों के नेता गोल टोपी पहनकर यह नौटंकी करते हैं, वह क्या असली इबादत है? इफ़्तार सुबह से भूखे-प्यासे रोज़ेदार के लिए होती है या तीन वक्त खाना खाने वाले नेताओं के लिए? इसे वोट बटोरने की साजिश नहीं कहें तो क्या कहें?

जब मुलायम इन्हीं वोटों की खातिर कह सकते हैं कि हां, मैंने कारसेवकों पर गोली चलवाई, कांग्रेस की सरकार रामसेतु मुद्दे पर लिखित हलफनामा दे सकती है कि राम एक काल्पनिक पात्र है, जो कभी हुए ही नहीं तो इफ़्तार पार्टी का आयोजन तो बहुत छोटी बात है। ऐसी आखिर क्या मजबूरी रही कि जिस अंकित सक्सेना नाम के युवा की एक मजहब के लोगों ने नृशंस हत्या कर दी, उसके पिता को अपनी धर्मनिरपेक्षता सिद्ध करने के लिए इफ़्तार पार्टी देना पड़ी? सवाल है कि जैसे गंगा में डुबकी लगाने से पाप धुल जाते हैं, वैसे ही क्या इफ़्तार पार्टी देने से कोई दल या व्यक्ति धर्मनिरपेक्ष बन जाता है?

क्रमशः

-सचिन पौराणिक

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