शेरनियां नही कातिल हत्यारिन

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दिल्ली हिंसा (Delhi Riots 2020) में कॉन्स्टेबल रतनलाल की हत्या जिस भीड़ ने की थी उसकी तस्वीरें (Delhi burns)  सामने आ गयी है। तस्वीरें इतनी विभत्स (Delhi Violence Video Viral) है कि उन्हें देखकर किसी का भी खून खौल (Delhi police) सकता है। पहले बातचीत के लिए पुलिस को बुलाया गया और उसके बाद अचानक से लाठी, डंडे, तमंचे, लोहे की रॉड और पत्थर लेकर भीड़ ने पुलिस को घेरकर हमला कर दिया। सबसे (Delhi Violence Video Viral)  ज्यादा चौंकाया महिलाओं ने जो लगातार हिंसा कर रही थी और पुलिस पर पत्थर फेंके जा रही थी।इन तस्वीरों ने नागरिकता कानून के खिलाफ (CAA Protest) तथाकथित शांतिपूर्ण आंदोलन की हकीकत उजागर कर दी। जिन महिलाओं को शेरनी बताया जा रहा था वो असल मे दंगाई निकली। अहिंसा और संविधान की बात करने वालों की मुखोटे उतर गए और उनका असली चेहरा सामने आ गया। शाहीन बाग़ के आंदोलन (Shaheen Bagh Protest) पर अहिंसा का जो नकाब पहनाया गया था वो कितना कमजोर और झूठा था वो कल के वीडियो ने साबित कर दिया। ये दावे के साथ कहा जा सकता है कि हाथो में पत्थर लेकर पुलिस को पत्थर मारती ऐसी महिलाएं किसी अन्य वर्ग में नही पायी जाती।

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महिलाएं तो ममता (Delhi Violence Video Viral) और दया की मूरत होती है। लेकिन पुलिस पर पत्थर बरसाती  (Arvind Kejriwal) इन बुर्कानशीं महिलाओ ने पूरे देश की महिलाओं का सर शर्म से झुका दिया। शाहीन बाग़ जैसे आंदोलनों की ये कड़वी सच्चाई है। अहिंसा, संविधान और देश की बातें इनके लिए कोरी बकवास थी। इनका असली मकसद ही देश को हिंसा की आग में झोंकने का था। ताहिर हुसैन (Tahir Hussain)  जैसे दंगाई इस आंदोलन की आड़ में दंगे की फैक्ट्री खोलकर बैठ गए और भारी मात्रा में मौत का सामान जुटा लिया।यहां सोचने की बात ये है कि जब हजारों की भीड़ सशस्त्र पुलिस वालों को जान से मार सकती है तो निहत्थे समाज के साथ ये क्या नही कर सकते? इस परिस्थिति का दूसरा पक्ष भी सोचिए। अगर पुलिस अपने बचाव में गोली चला देती, जो कि चलानी चाहिए थी, तो ये दंगाई अपने आप को दूध का धुला और हिंसा का शिकार बताते नही थकते। जावेद अख्तर (Javed Akhtar) जैसे आतंकियों के बौद्धिक समर्थक खुलकर पुलिस का विरोध करते और देश के गृहमंत्री का त्यागपत्र मांग लिया जाता।

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कल का वीडियो (Delhi Violence Video Viral) सामने आने के बाद भी कुछ लोगों की नींद नही खुल रही है। क्योंकि ये लौग नींद में है नही सिर्फ आंखे बंद करके सोने का नाटक कर रहे है। इनकी आंखे तभी खुल पाएंगी जब अंकित शर्मा या रतनलाल जैसा कोई इनका रिश्तेदार इस हिंसा का शिकार बनेगा। देश का एक बड़ा वर्ग पहले दिन से शाहीन बाग़ आंदोलन (Shaheen Bagh Movement)  की इस सच्चाई को जनता था। वो जानता था कि मौका मिलते ही ये लौग आग लगाएंगे और दंगे भड़काएँगे। शांतिपूर्ण आंदोलन ये लौग कभी कर ही नही सकते। लेकिन राजनीतिक वजहों के चलते इन्हें बर्दाश्त किया गया जिसकी कीमत दिल्ली की आम जनता ने चुकाई।कल के वीडियो के सामने आने के बाद जनता को समझना चाहिए कि हमारी पुलिस किन हालातो में जनता की सुरक्षा करती है? अपनी जान गंवाकर भी पुलिस अपना कर्तव्य निभाती है। हमें गर्व है हमारे देश की बहादुर और मानवीय संवेदनाओं से भरी पुलिस पर। लेकिन साथ ही पुलिस से निवेदन भी है कि ईन दंगाइयों का पुख्ता इलाज़ किया जाए। क्योंकि पुलिस समाज की रक्षक है और रक्षक को ही कमजोर किया जाएगा तो पूरा समाज खतरे में आ जायेगा। ये खतरा छोटा-मोटा नही बहुत बड़ा है। इसलिए शांतिप्रिय जनता, सरकार और पुलिस को साथ मिलकर इन दंगाई तत्वो पर सख्त कार्यवाही करना होगी।

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Sachin Pauranik

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