ये तस्वीरें भूलना चाहेगी कांग्रेस…!

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अंग्रेजी में कहा जाता है कि – “अ पिक्चर इज़ वर्थ अ थाउजेंड वर्ड्स”

अर्थात एक चित्र हज़ार शब्दों से भी ज्यादा मूल्य रखता है। इसे ही हमारे गांव देहात की भाषा में कहते हैं- “सौ बका-एक लिखा|” इसका मतलब भी लगभग यही है कि कही गई बातों का ज्यादा मूल्य नहीं होता। असली मूल्य लिखी गई बातों का या तस्वीरों का ही होता है।

राष्ट्रवाद, देशभक्ति, सहिष्णुता, विविधता और भारतीयता इन पांच शब्दों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में कल पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा दिए गए ऐतिहासिक उद्बोधन को समेटा जा सकता है। इस बहुप्रतीक्षित उद्बोधन के पहले प्रणब दा ने हेडगेवार की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें भारत का सच्चा सपूत बताया था, जिससे कांग्रेस के नेताओं के दिलों की धड़कनें बढ़ गई थीं।

प्रणब दा ने कल जैसे ही अपना उद्बोधन अंग्रेजी में शुरू किया, वैसे ही तमाम समाचार चैनलों के संपादक और एंकर इसका मतलब समझने की कोशिश करते दिखाई दिए। प्रणब दा ने भी अपने दशकों के राजनीतिक अनुभव को जिस प्रकार शब्दों में ढालकर राष्ट्रवाद की परिभाषा समझाई, उसे सुनकर हर कोई दंग रह गया क्योंकि उनके भाषण में उम्मीद के विपरीत सर्व समावेशी विचारों की झलक दिखाई दी, जिसमें सीधा निशाना किसी पर भी नहीं साधा गया। संघ के मंच से उन्होंने एक शब्द भी ऐसा नहीं कहा, जिसमें विवाद या सनसनी की कोई भी गुंजाइश बाकी रह सके।

उनके उद्बोधन के बाद काफी समय तक यही संशय बना रहा कि उन्होंने संघ की विचारधारा का समर्थन किया है या कांग्रेस की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सोच का? आनन-फानन में कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने  प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर उनके भाषण को संघ को सीख देने वाला बताया तो भाजपा के प्रवक्ता इस भाषण को संघ की सोच से मिलने वाला बताने में जुट गए।

खैर, प्रणब दा के भाषण का असली सार सिर्फ वे ही जानते हैं, लेकिन संघ के मंच पर प्रणब मुखर्जी जैसे कद्दावर कांग्रेसी नेता का खड़ा होना ही काफी था कांग्रेस को चिढ़ाने और संघ-भाजपा वालों के खुश होने के लिए। शर्मिष्ठा ने सही कहा था कि दादा का भाषण भुला दिया जाएगा, लेकिन तस्वीर ताउम्र याद रह जाएगी। इतने सालों तक संघ को सफलतापूर्वक ‘अछूत’ संगठन का तमगा देने वाले कांग्रेसियों को संघ के मंच पर प्रणब दा की तस्वीर लंबे अरसे तक चुभेगी।

संघ का तृतीय वर्ग हर साल होता आया है और इसमें कोई नई बात नहीं थी, लेकिन सिर्फ प्रणब दा के आने मात्र से इस कार्यक्रम की इतनी चर्चा हुई, जितनी आज तक कभी नहीं हो पाई। संघ और भारतीय राजनीति के इतिहास में कल के दिन को एक विशेष महत्व के लिए याद रखा जाएगा। कांग्रेस डर रही है कि अब से हर बार संघ पर हमला बोलने पर कांग्रेस वालों को इसी मंच पर प्रणब दा की तस्वीर दिखलाई जाएगी, जिसका जवाब देना उनके लिए मुश्किल होगा।

इन तस्वीरों को देखकर संघ-भाजपा के लोग मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं और कांग्रेस की खीझ मनीष तिवारी जैसे नेताओं के प्रणब दा से सवाल पूछने से जगजाहिर होती जा रही है। कल की ये तस्वीरें भारत की राजनीति में दीर्घकालिक प्रभाव डालेंगी और इतिहास में एक खास दस्तावेज के रूप में सहेजी जाएंगी।

-सचिन पौराणिक

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