मजबूर सड़क

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देश में कुछ अलग ही माहौल बना हुआ है। नागरिकता कानून (CAA)को लेकर चल रहे विरोध (CAA Protest Delhi) और समर्थन दोनों रुकने का नाम नही ले रहे है। लेकिन सबसे ज्यादा समय से विरोध दिल्ली के शाहीन बाग( Delhi ) में चल रहा है। इस विरोध की अगुवाई महिलाएं और बच्चे कर रहे है। इन प्रदर्शनकारियों ने बगीचे पर तो कब्ज़ा कर ही रखा है साथ ही दिल्ली-नोएडा मुख्य मार्ग को भी बाधित कर रखा है। बगीचे में विरोध समझ आता है लेकिन सड़क रोककर विरोध करना न सिर्फ समझ से बाहर है बल्कि प्रदर्शनकारियों के बदइरादे भी दर्शाता है।

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नागरिकता कानून (CAA Protest Delhi)  संसद में पास हो चुका है इसलिए ये पूर्णतः संवैधानिक है। अब इसके विरोध का भला क्या औचित्य है? शशि थरूर, मणिशंकर अय्यर, कन्हैया जैसे नेता शाहीन बाग में अपनी राजनीति चमकाने पहुंच जातें है लेकिन सड़क को खुलवाने को लेकर इनके मुह से एक शब्द नही निकलता। इनके विरोध की सज़ा सामान्य नागरिक को क्यों दी जा रही है? इन्हें ये समझ नही आ रहा कि सड़क जाम करने से सरकार को परेशानी होती है या आम जनता को?

(CAA Protest Delhi)  शाहीन बाग आंदोलन में 500 से 800 रूपये देकर महिलाओं को बैठाया जा रहा है, लंगर चल रहे है, ड्रामे हो रहे है, नौटंकी अपनी चरम सीमा पर पहुंच गई है। लाखो लौग इससे परेशान हो रहे है लेकिन कोर्ट ने कहा कि दिल्ली पुलिस अपने हिसाब से कार्यवाही करें। इस फैसले को ‘डिकोड’ करें तो दो बातें निकलकर सामने आती है। पहली ये की कोर्ट खुद एक वर्गविशेष के खिलाफ सीधा फैसला सुनाने में कतराता है। दूसरा ये की अगर दिल्ली पुलिस सख्ती के साथ इन्हे हटाएगी तो यही कोर्ट दिल्ली पुलिस (Delhi Police) से फिर जवाब मांगेगी।

असल मे शाहीन बाग (Shaheen Bagh Movement) का ड्रामा विरोध कम पिकनिक ज्यादा दिखाई देता है। (CAA Protest Delhi) मुफ्त का खाना, मुफ्त में रहना, मुफ्त का अलाव, मुफ्त में एंटरटेनमेंट और ऊपर से 500 रुपये नकद। ऐसे विरोध में भला कौन शामिल नही होना चाहेगा? कहा जा रहा है कि की देश के हर शहर में शाहीन बाग बना देंगे। भीम आर्मी वाले चंद्रशेखर कह रहे थे कि अगले कुछ दिनों में पांच हजार शाहीन बाग बना दिये जायेंगे। इस बयान का स्वागत होना चाहिये।

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बेरोजगारी (Unemployment) से जूझ रहे देश में 500 रुपये के लिए हजारों लोग जुट जाएंगे। (CAA Protest Delhi) ध्यान सिर्फ इतना रखना है कि विरोध से आम जनता को तकलीफ न हो। लेकिन ऐसा हो नही सकता। इसके अलावा एक बात जो विचलित करने वाली है वो ये की नागरिकता कानून के विरोध में आज़ादी के नारे क्यों लगाये जाते है? आज़ादी के नारे ये शक पैदा करतें है कि एक वर्ग इस देश के फिर से टुकड़े करना चाहता है। क्योंकि आज़ादी के नारों को किसी प्रकार भी न्यायोचित नही ठहराया जा सकता।

शाहीन बाग आंदोलन (Shaheen Bagh Movement) असल में एक निराशा का प्रतीक बन चुका है। (CAA Protest Delhi)  ये लौग उस कानून के विरोध में नौटंकी कर रहे है जिसका इनसे कोई लेना देना ही नही है। लेकिन बात इतनी सीधी नही है साहब, ये विरोध असल मे नागरिकता कानून का नही बल्कि आगे प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण और समान नागरिक संहिता का है। इन्हें डर है कि सरकार पर अब भी दबाव नही बनाया गया तो आगे आने वाले कानून देश के सभी नागरिकों को बराबरी के कानून के नीचे खड़ा कर दिया जाएगा। इससे अल्पसंख्यक तुष्टीकरण पर विराम लगेगी और मजहबी एजेंडा आगे नही बढ़ाया जा सकेगा। असल मे ये कानून ‘गज़वा-ऐ-हिन्द’ का सपना देखने वालों के लिए बड़ा झटका है। अपने दशकों की मेहनत पर राष्ट्रवादी सरकार का पानी फेरना इन्हें सुहा नही रहा है।

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