भाजपा का तिलिस्म अब टूटने लगा

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आईआरडीए द्वारा बीमा बेचने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं। बीमा अभिकर्ता को पहले एक परीक्षा पास करनी होती है, जिसके बाद ही वह बीमा करने के योग्य बन पाता है। इस परीक्षा के लिए भारत के सबसे बड़े बीमा ब्रांड ‘भारतीय जीवन बीमा निगम’  यानी एलआईसी ने हर कार्यालय में ट्रेनिंग अधिकारी नियुक्त कर रखे हैं। वे सभी परीक्षार्थियों को यही बात समझाते हैं कि इस परीक्षा में आमतौर पर सभी पास हो जाते हैं सिवाय दो तरह के लोगों के।

पहले जो बिल्कुल ही तैयारी नहीं करते और दूसरे जो कुछ ज्यादा ही तैयारी कर लेते हैं। जो बिल्कुल तैयारी नहीं करता, वो इसलिए फेल होता है क्योंकि उसे कुछ समझ ही नहीं आता कि आखिर कहां से पर्चा शुरू किया जाए क्योंकि तैयारी कभी की नहीं है जबकि ज्यादा तैयारी कर लेने वाले इसलिए परेशान होते हैं कि वे यह समझ नहीं पाते कि पहले कौन-सा प्रश्न हल किया जाए।

इस उधेड़बुन में समय समाप्त हो जाता है और दोनों ही फेल घोषित कर दिए जाते हैं। देश में भी इस वक्त कुछ-कुछ ऐसे ही हालात बने हुए हैं। एक कांग्रेस पार्टी है, जो विपक्ष में है, जिनके पास किसी भी तरह की कोई तैयारी नहीं है और दूसरी तरफ भाजपा है, जिसने इतनी ज्यादा तैयारी कर रखी है कि उसे समझ ही नहीं आ रहा है कि पहले करना क्या है? यह देश का दुर्भाग्य ही है कि अपनी-अपनी जगह दोनों ही दल फेल हो चुके हैं।

सरकार को घेरने के लिए कांग्रेस के पास विरोध नीति की कोई रूपरेखा नहीं है तो सत्ता पक्ष ने इतने बड़े-बड़े वादे कर रखे हैं कि उन्हें समझ ही नहीं आ रहा है कि पहले कौन-सा काम पूरा किया जाए? पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के विरोध में आज कांग्रेस का ‘भारत बंद’ है। सुबह से राहुल गांधी, सोनिया गांधी सहित कांग्रेस के आला नेता पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ने के विरोध में पैदल मार्च कर रहे हैं। मानसरोवर यात्रा खत्म करके दिल्ली लौटे राहुल गांधी नई ऊर्जा के साथ विरोध की कमान सम्हाल रहे हैं तो पेट्रोल में लगी आग बुझाने का कोई साधन सरकार के पास दिखाई नहीं दे रहा है।

जब कांग्रेस सत्ता में थी तो विरोध का आलम यह होता था कि सरकार अगर 50 पैसे भी पेट्रोल के दाम बढ़ाती थी तो भाजपा सड़कों पर उतरकर ऐसा उग्र विरोध करती थी कि शाम होते-होते बढ़ी कीमतें आधी कर दी जाती थीं। भाजपा के नेता सड़कों पर बैठ जाते थे और ऐसा लगता था कि ये लोग कभी सत्ता में आए तो क्या मजाल कि पेट्रोल-डीज़ल के भाव 2 रुपए भी बढ़ जाए। नरेंद्र मोदी समेत भाजपा नेताओं के पुराने भाषण, ट्वीट पढ़े जाए तो पता चलेगा कि सत्ता में आने के साथ ही इंसान की याददाश्त भी कमजोर हो जाती है और चमड़ी भी मोटी हो जाती है। सत्ता की मलाई खा रहे भाजपा नेताओं को यह बताना चाहिए कि दुनिया में क्रूड के भाव लगभग आधे हो चुके हैं, उसके बाद भी भारत में पेट्रोल-डीज़ल शतक की तरफ क्यों बढ़ रहे हैं? जिन अंतरराष्ट्रीय हालातों के पीछे ये छुपने की कोशिश कर रहे हैं, क्या वे पहले कभी नहीं थे? कांग्रेस के जमाने मे क्या पेट्रोल खाड़ी देशों के बजाय अमेठी-रायबरेली से आता था? आखिर क्यों तेल की कीमतें बढ़ाकर जनता का तेल निकाला जा रहा है| 56 इंची सरकार द्वारा?

न महंगाई काबू में आ रही है न युवाओं को रोज़गार मिल रहा है, न राममंदिर बन रहा है, न ही समान नागरिक संहिता का कोई जिक्र कर रहा है। सवाल है कि भाजपा के लोग इतनी बेशर्मी लाते कहां से हैं? कांग्रेस को भी अब चुनाव करीब आ रहे हैं तो पेट्रोल-डीजल याद आ रहा है वरना जनता तो देशभक्ति के नाम पर अपनी जेब पिछले चार सालों से कटवाती आ रही है।

आईआरडीए की परीक्षा में फेल होने वाले दो तरह के लोगों के समान विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों ही बिना किसी तैयारी के सिर्फ फेल होने के लिए जनता के सामने खड़े हैं इसलिए जनता को तीसरा विकल्प ‘नोटा’ इस बार ज्यादा आकर्षित कर रहा है क्योंकि नोटा से नाउम्मीद होने की कोई गुंजाइश ही नहीं है? जिस नरेंद्र मोदी की साफ छवि को भाजपा अपना ब्रह्मास्त्र मानती है, उनका तिलिस्म भी अब टूटने लगा है। लोग कहने लगे हैं कि मोदीजी ने भी बाकियों की तरह देश को बेवकूफ ही बनाया है। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में ‘नोटा’ इस बार अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज कराने को तैयार है।

-सचिन पौराणिक

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