हिंदुत्व को छोड़ना भाजपा को पड़ेगा महंगा

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भाजपा भारत की ऐसी पार्टी है, जिसके मूल में हिंदुत्व की भावना है। हिंदुत्व ही उसका आधार है और भाजपा के इस पौधे के अंकुरण में हिंदुत्व ने ही पानी, प्रकाश, हवा और मिट्टी मुहैया करवाई है। पौधा चाहे वृक्ष बन जाए, लेकिन उसकी जड़ में ही उसकी जान होती है। ऐसे ही हिंदुत्व इस पार्टी का आधार था, है और रहेगा। यदि इस पौधे की जड़ पर चोट पहुंचाई जाए या इसे कमजोर करने की कोशिश की जाए या यूं कहें कि यदि इस पौधे की जड़ में मट्ठा ही डाल दिया जाए तो फिर इसे मुरझाने से कोई नहीं रोक सकता। भाजपा के इसी हिंदुत्व के इन दिनों चीथड़े उड़ते जा रहे हैं। दशकों के राजनीतिक घटनाक्रम के बाद 2014 में जब नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार के प्रधानमंत्री बने, तब उनसे उम्मीद थी कि वे देश के विकास के साथ पार्टी की जड़ों को भी पोषण देंगे, लेकिन उन्होंने उम्मीदों के विपरीत 4 साल में हिन्दुत्व के एजेंडे को चालाकी से विकास की तरफ मोड़ दिया।

कुछ दिन पहले जब नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के करीब 16 लेन के एक्सप्रेस हाईवे का उद्घाटन अपनी मार्केटिंग स्टाइल में किया, तब यकायक मन में आया कि क्या सिर्फ हाईवे बनाने के लिए देश के लोगों ने मोदीजी को जिताया था? नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में उदय तब हुआ, जब 2002 में गुजरात के गोधरा में कारसेवकों को बर्बरता से आग लगाकर ज़िंदा जला दिया गया। इसके बाद गुस्से के प्रतिक्रियास्वरूप फैली दंगों की आग की तपन से पूरे देश की राजनीति तप गई। उसके बाद नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति में एक ऐसे नाम बन गए, जिन्हें आप गालियां दो चाहे तारीफ करो, लेकिन नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते हैं। विरोधियों और मीडिया ने 2002 के बाद से लगातार उन पर हमले किए| वे आतंकवादियों की हिटलिस्ट में भी आ गए, लेकिन 2002 के बाद से मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ लगातार बढ़ता चला गया। यह बात सच है कि इसके बाद मोदीजी ने अपनी राजनीति को विकास पर केंद्रित करके गुजरात को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, लेकिन उनकी कट्टर हिन्दू और हिंदुओं के मसीहा की जो छवि जनता के मन में बनी, वह कालांतर में हुई कई घटनाओं से प्रबल होती गई। चाहे गोल टोपी पहनने से उनका इनकार करना हो चाहे इफ्तार पार्टियों से दूरी बनाना, इन सब वजहों से उनकी लोकप्रियता में भारी इज़ाफ़ा हुआ। इसी वजह से नेतृत्व संकट से जूझ रही भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी की लहर पर सवार होकर 2014 में राजनीतिक सफलता का नया इतिहास रच दिया। इसके बाद लोगों को उम्मीद थी कि मोदीजी का वही उग्र हिंदुत्व और विकास वाला रूप पूरे देश को देखने को मिलेगा, लेकिन मोदीजी ने 4 सालों में देश-विदेश के मंदिरों में जाने के अलावा एक काम ऐसा नहीं किया, जिस पर उनके चाहने वाले अभिमान कर सके।

अज़ान की आवाज़ सुनकर अपना भाषण रोकना हो चाहे गोरक्षकों को गुंडा कहना हो, रमज़ान में कश्मीर में संघर्षविराम करवाना हो या महबूबा सरकार से गठबंधन, उनकी हर अदा में पिछले कुछ वर्षों से धर्मनिरपेक्षता की बू आने लगी। हालिया प्रकरण में जब विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने राष्ट्रीय सुरक्षा को ताक पर रखकर सादिया सिद्दीकी उर्फ़ तन्वी सेठ को नियमों के विपरीत जाकर तत्काल पासपोर्ट जारी करवा दिया और एक ईमानदार अफ़सर का तबादला करवा दिया तो जनता का इस सरकार के प्रति गुस्सा फूट पड़ा। मोदीजी उधर 16 लेन का एक्सप्रेस-वे बनवा रहे हैं, इधर रामलला तंबू में बैठे हुए हैं। समान नागरिक संहिता की बात हो चाहे धारा 370 हटाने की बात हो अपने बुनियादी वादों को ही यह सरकार भुलाती जा रही है।

नरेन्द्र मोदी को यह समझना चाहिए कि विकास अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने भी बहुत किया था। इस देश में विकास के नाम पर ही यदि चुनाव जीते जाते तो जनता पुनः वाजपेयीजी की सरकार बनवा देती, लेकिन वाजपेयीजी ने भी हिंदुत्व के बदले हाईवे बनाने पर ही ज्यादा ध्यान दिया था। वाजपेयी साहब की सरकार दूसरे दलों की बैसाखियों पर टिकी थी इसलिए उन पर कोई आक्षेप तर्कसम्मत सिद्ध नहीं हो सकता, लेकिन मोदीजी के पास संसद में पूर्ण बहुमत है। राष्ट्रपति आपका है, उत्तरप्रदेश सहित देश के लगभग 20 राज्यों में भाजपा या फिर सहयोगियों की सरकारें हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि राम मंदिर अब नहीं तो कब? धारा 370 और समान नागरिक संहिता भी अब नहीं तो कब? पुशअप्स और सेहत बनाने के लिए आपको बहुत समय मिलेगा, जब जनता आपको फिर से विपक्ष में बैठा देगी, लेकिन ये पूर्ण बहुमत की सरकार और ऐसी अनुकूल परिस्थितियां दोबारा कभी नहीं मिलने वाली हैं। 10 महीने की सरकार अभी बची हुई है। अब भी यदि इन तीन बुनिवादी वादों में से एक भी पूरा नहीं होता है तो देश की बहुसंख्यक आबादी के साथ यह अब तक का सबसे बड़ा छल होगा। हिंदुत्व को छोड़कर विकास का दामन थामना भाजपा सरकार को बहुत महंगा पड़ने वाला है।

-सचिन पौराणिक

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