भाजपा और मोदी अपने वोटर पहचानें

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राजनीति से जुड़े हुए लोगों के सपने भी आम जनता जैसे नहीं होते हैं। आम आदमी जहां आज भी प्रमोशन या फिर नौकरी मिलने या विदेश घूमने के ही सपने देख रहा है वहीं राजनीति से जुड़े लोग प्रधानमंत्री बनने के सपने देखा करते हैं क्योंकि दिनभर इंसान का मन जहां भटकता है, सपने भी वैसे ही बन जाते हैं, लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि इस देश में प्रधानमंत्री खुद लोगों के सपने में आते हैं और अपने बेटे को वोट देने की अपील करते हैं। जी हां, ऐसा एक बार नहीं बल्कि हर चुनाव में होता आया है।

पश्चिमी उत्तरप्रदेश जाट बहुल इलाका है, जहां दो नेताओं ने जमीनी स्तर पर कार्य करके जनता के दिलों में एक अलग जगह बनाई। आज भी पश्चिम यूपी में इन दो नेताओं की तोड़ का कोई नेता नहीं है। पहले थे भूतपूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरणसिंह और दूसरे किसान नेता महेंद्रसिंह टिकैत। हालांकि ये दोनों नेता अब नहीं रहे, लेकिन चौधरी चरणसिंह के बारे में कहा जाता है कि आज भी हर चुनाव में मतदान के पहले वाली रात वे इलाके के बुजुर्गों के सपने में आते हैं और अपने बेटे का ख्याल रखने का कहकर उसके लिए वोट मांगते हैं। कहा जाता है कि सपने में चौधरी लोगों से कहते हैं कि मेरे बाद बेटे का ध्यान आपको ही रखना है और उसके बाद सुबह मतदान में जाट भावनाओं में बहकर नलके को वोट दे आते हैं।

चौधरी चरणसिंह के पुत्र अजीत सिंह हैं, जो उनकी विरासत को संभालने में सालों से लगे हैं, लेकिन ठीक से संभालने में नाकाम रहे हैं। राष्ट्रीय लोकदल के नाम से पार्टी चलाने वाले अजीतसिंह के उत्तरप्रदेश विधानसभा में कई विधायक हैं, लेकिन 2014 की मोदी लहर में वे पश्चिम यूपी की खुद की सुरक्षित समझी जाने वाली बागपत सीट भी हार गए और मायावती की तरह उनकी पार्टी का भी लोकसभा में खाता तक नहीं खुला, लेकिन अभी हुए कैराना उपचुनाव में जीत के साथ ‘नलके’ की लोकसभा में उपस्थिति दर्ज हो गई है।

जाट वोटर वैसे तो अपनी तमाम नाराजगियों के बाद भी परंपरागत तौर पर रालोद के साथ रहता था, लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों के बाद से 2014 में जाट वोट एकमुश्त भाजपा में शिफ्ट हो गए थे, लेकिन इस उपचुनाव नतीजे को देखकर लगता है कि अजीत सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी की मेहनत रंग लाई है और जाट फिर नलके के साथ आ गए हैं। कैराना के उपचुनाव में जीत ने रालोद सहित विपक्ष को भले ही खुश होने का मौका दे दिया हो, लेकिन आंकड़ों पर गौर करें तो यह खुशी ज्यादा लंबी टिकने वाली नज़र नहीं आ रही है।

कैराना लोकसभा सीट पर लगभग 54% मतदान हुआ है, जबकि 2014 में यहां करीब 73% मतदान हुआ था। कम मतदान भाजपा के खिलाफ रहता है जबकि मुस्लिम समाज हमेशा से ही लामबंद होकर किसी को जिताने के बजाय किसी को हराने के लिए वोट करता है। कैराना की कुल आबादी में 35% मुस्लिम हैं, जिनका एकतरफा वोट रालोद को मिला और जाटों ने भी नलके का बटन दबाकर विपक्ष के संयुक्त प्रत्याशी की जीत तय कर दी। विपक्ष के एकजुट होकर प्रत्याशी उतारने से भी वोटों का केंद्रीकरण हुआ, लेकिन इतना होने के बाद भी जीत का अंतर मात्र 50 हजार के लगभग रहना यह दर्शाता है कि हिन्दुओं का वोट भी भाजपा के पक्ष में लामबंद हुआ है। यदि यही मतदान 70% के पार चला जाता तो मृगांका की जीत तय थी।

उपचुनाव को जनता गंभीरता से नहीं लेती है इसलिए मतदान का प्रतिशत हमेशा कम ही रहता है, लेकिन भाजपा के लिए यह सबक जरूर है कि जिस अल्पसंख्यक वर्ग को आप खुश करने की कोशिश कर रहे हैं, उसका कोई ठोस नतीजा नहीं निकलने वाला। इसके विपरीत इससे जो वर्ग आपके साथ जुड़ा है, उसके भी बिदकने का डर रहेगा। भाजपा और मोदीजी को अपने वोटर को पहचानने की जरूरत है और उसी हिसाब से कदम उठाने की क्योंकि बेशक आपकी योजनाएं देशहित में अब तक कि सर्वश्रेष्ठ हैं, लेकिन उन्हें आप पूरा तभी कर पाएंगे, जब 2019 में जनता आपको पुनः चुनकर दिल्ली भेजेगी।

-सचिन पौराणिक

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