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Talented View : डॉक्टरों की हड़ताल सरकार के लिए बड़ी चुनौती

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डॉक्टरों को भगवान का रूप माना जाता है। क्योंकि कई बार ऐसी परिस्थितियां बन जाती है जब डॉक्टर भगवान बनकर आतें हैं और अपने प्रियजनों को मौत के मुंह से निकाल लाते हैं। शायद इसलिए कहा जाता है कि भगवान और डॉक्टर आपस में जुड़े हुए हैं। डॉक्टर नाराज़ तो भगवान से जल्दी मिलना और भगवान नाराज़ तो डॉक्टर से मिलना हो जाता है। परंतु बीते कुछ सालों में हज़ारों किस्से ऐसे हुए जिससे अब डॉक्टरों को भगवान मानने का दिल नही करता।

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दिल के मरीजों की बेवजह बायपास और स्टंट लगाने से लेकर सामान्य प्रसूति को जानबूझकर सीज़र करने से लेकर ऐसा कोई काम इन डॉक्टरों ने नही छोड़ा जिससे मरीज़ों को लूटा न जा सके। डॉक्टर अपने पेशे को सेवा नही बल्कि कमाई का जरिया बना चुके है। इसलिए मरीज़ उन्हें ‘पीड़ित’ कम बल्कि ‘ग्राहक’ ज्यादा नज़र आता है। और बात जब ग्राहक और दुकानदार की आ जाती है तो डॉक्टर भी किराना की दुकान पर बैठे ‘लाला’ की तरह ही बर्ताव करने लगतें है। उनके लिए मरीज़ उस बकरे की तरह होता है जिसे हलाल करने में पूरा अस्पताल लग जाता है।

डॉक्टरों पर ये चर्चा आज इसलिए चली है क्योंकि बंगाल में कुछ दिनों से जूनियर डॉक्टर हड़ताल पर हैं। एक मरीज़ के परिजनों द्वारा डॉक्टरों से मारपीट के विरोध में ये डॉक्टर हड़ताल पर है। डॉक्टर मारपीट करने वालों के खिलाफ प्रकरण दर्ज करने और खुद की सुरक्षा की मांग को लेकर हड़ताल पर हैं। बंगाल के डॉक्टरों के समर्थन में मेडिकल एसोसिएशन के अलावा विभिन्न राज्यों के डॉक्टर भी आ गए हैं। ऊपर से देखने पर डॉक्टरों की ये मांगें वाजिब भी लग रही है। सही है कि अगर डॉक्टरों को सुरक्षा ही नही मिलेगी तो वो अपना काम कैसे करेंगे?

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लेकिन अगर आपका वास्ता कभी सरकारी डॉक्टरों, अस्पतालों और वहां की अव्यस्थाओं से पड़ा है तो आप डॉक्टरों का समर्थन हरगिज़ नही कर सकते। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर कभी टाइम पर आते नही, मरीज़ को ठीक से देखते भी नही और साथ ही उनका व्यवहार भी बेहद रूखा होता है। लेकिन यही डॉक्टर अपने निजी क्लिनिक ठीक समय से पहुंचते हैं और मरीज़ों को भी अच्छे से देखतें है। ये भी सच है की ये डॉक्टर कमीशन के चक्कर मे मरीज़ों को एक विशेष फार्मा कंपनी की ही दवाइयां भी लिखतें है। इसके बदले में मेडिकल रिप्रजेंटेटिव और कंपनियां इन्हें मोटा कमीशन देती है।

A doctor holds a placard at a government hospital during a strike demanding security after the recent assaults on doctors by the patients’ relatives, in Agartala, India, June 14, 2019. REUTERS/Jayanta Dey TPX IMAGES OF THE DAY

ऐसे में कोई हालातों का मारा सरकारी अस्पताल में अपने परिजनों को लेकर पहुंचता है तो ये डॉक्टर कई बार उसे लापरवाही से देखते हैं। बजाय उसकी तकलीफ समझने के ये डॉक्टर मरीज़ और उनके परिजनों के साथ भी अच्छा व्यवहार नही करते। ऐसे हालात मरीज़ के परिजनों के गुस्से को और भड़का देतें है। भावनाओं के ज्वार से पहले ही जूझ रहा आदमी ऐसे हालातों में अपना आपा खो बैठता है और डॉक्टरों को ही निशाना बना लेता है। हालांकि डॉक्टरों के साथ मारपीट समस्या का समाधान नही है लेकिन परिजनों के गुस्से को भी समझने की जरूरत है।

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बंगाल में हालात बाकी जगहों से थोड़े अलग हैं। यहां हिंसा एक वर्ग विशेष के लोगों द्वारा की जा रही है और वो भी संगठित होकर। ये लोग बाकायदा सोशल मीडिया द्वारा लोगों को बुलाकर अस्पतालों में मारपीट कर रहे हैं। ये एक तरह का ‘जिहाद’ है जिसकी भर्त्सना की जानी चाहिए। राज्य सरकार को ऐसे मामलों में दोषियों पर कठोर कार्यवाही करना चाहिए और डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहिए। ये सच है कि कुछ डॉक्टर लालच और स्वार्थ में अंधे हो चुके हैं लेकिन ये भी सच है कि कुछ डॉक्टर आज भी मानवता की भलाई के लिए काम कर रहे हैं।

आज निस्वार्थ सेवा कर रहे डॉक्टरों की संख्या में कमी आ रही है जबकि कमाई के चक्कर में ‘कसाई’ बनने वाले डॉक्टर बेतहाशा बढ़ रहे हैं। ऐसे हालातों में डॉक्टरों के साथ होने वाली हिंसा रोकना वाकई सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनने वाली है। डॉक्टरों को भी सोचना चाहिए कि आपको मांगे सरकार से मनवानी है तो इसके लिए सामान्य जनता को क्यों ‘मारा’ जा रहा है? आपकी लड़ाई सरकार से है, अपनी मांगे मनवाने के लिए आप विरोध करने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन आप आम आदमी को ऐसे ही मरने के लिए कैसे छोड़ सकतें है? अपनी मांगे सरकार से मनवाने के लिए आप आम आदमी की ज़िंदगी से खिलवाड़ करेंगे तो जनता के मन मे भी डॉक्टरों के प्रति सहानुभूति खत्म हो जाएगी। मरीज़ और डॉक्टर के बीच “अविश्वास” की इस बढ़ती खाई को पाटना दिनो-दिन मुश्किल होता जाएगा।

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