‘कम्फर्ट ज़ोन’ से बाहर निकलकर दूसरे की पिच पर खेलने का दांव

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राहुल गांधी कैलाश यात्रा करके आए हैं,  मंदिरों में भी खूब जा रहे हैं तो मोदीजी मस्जिदों में घूम रहे हैं और अज़ान की आवाज़ सुनकर माइक पर बोलना भी बंद कर देते हैं। इधर, मोहन भागवत कह रहे हैं कि मुसलमानों के बिना हिंदुत्व नहीं बचेगा। आखिर यह देश में चल क्या रहा है?  हर कोई दूसरे की पिच पर खेलने के लिए इतना आतुर क्यों दिखाई पड़ रहा है? खुद के परंपरागत वोटरों पर क्या अब नेताओं को भरोसा नहीं रहा ?  कांग्रेस जो कि अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण करने के लिए बदनाम थी, अचानक हिन्दू चोले में नज़र आने लगी है। राहुल गांधी का शिवभक्त बन जाना, मंदिरों में जाना और मानसरोवर की यात्रा यूंही नहीं हो रही है। कांग्रेस का राहुल गांधी को जनेऊधारी हिन्दू बतलाना भी बेवजह नहीं है।

दरअसल, कांग्रेस को यह लगने लगा है कि सिर्फ अल्पसंख्यक वोटों के सहारे चुनावी नैया पार लगेगी नहीं इसलिए उनकी नज़र अब हिन्दू वोटों पर आ टिकी है, लेकिन हिन्दू वोटों के सहारे सत्ता में पूर्ण बहुमत से बैठी भाजपा के नेताओं को सेक्युलर बनने का भूत क्यों चढ़ा है, यह समझ नहीं आ रहा। नरेंद्र मोदी का मस्जिद जाना, गौरक्षकों को गुंडा कहना और अल्पसंख्यकों के प्रति विशेष प्रेम जाहिर करना अचरज का विषय है। भाजपानीत एनडीए सरकार ने हिंदुत्व के लिए एक भी ऐसा कोई काम पिछले 4 सालों में नहीं किया, जिसकी उम्मीद उनके मतदाताओं को थी।

गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी का भारत के राजनीतिक परिदृश्य में उदय ही 2002 की घटना के बाद हुआ, जिसकी वजह से उन्हें उग्र हिंदुत्व के चेहरे के तौर पर देखा जाने लगा था। इधर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने पिछले तीन दिनों में जो बयान दिए हैं, उससे एक तरफ उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की है कि केंद्र सरकार को वो रिमोट से नहीं चलाते तो दूसरी तरह उन्होंने हिंदुत्व शब्द को दोबारा परिभाषित करने की कोशिश की है। संघ प्रमुख का बयान कि मुसलमानों के बिना हिंदुत्व भी नहीं बच सकेगा, अब भी किसी को समझ नहीं आ रहा है। मुस्लिमों के 56 देश हैं, जहां हिंदुत्व का कोई नामलेवा नहीं है। भारतीय उपमहाद्वीप में भी पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं की संख्या तेज़ी से घट रही है, ऐसे में समझ नहीं आ रहा कि मुसलमानों के नहीं रहने से हिंदुत्व कैसे नहीं बच पाएगा?

सवाल है कि मुस्लिमों से ही हिंदुत्व है तो यह हिंदुत्व बांग्लादेश और पाकिस्तान में मुरझा क्यों गया? वहां के हिन्दू क्यों अपमानजनक जिंदगी जीने को मजबूर हैं? खैर, दिल्ली में संघ के तीन दिन चले शिविर में कम से कम संघ से यह उम्मीद थी कि वो राममंदिर, समान नागरिक संहिता और धारा 370 पर कुछ कहेंगे, सरकार पर दबाव बनाएंगे, लेकिन चुनावी साल में सभी नेताओं और संगठनों को नए अवतार में देखकर देश की जनता हैरान, परेशान है। मोदीजी, राहुल गांधी, संघ प्रमुख मोहन भागवत सभी ऐसे बयान दे रहे हैं, जिनकी उनसे उम्मीद बिल्कुल नहीं थी। आज ही केंद्र ने तीन तलाक मामले में अध्यादेश को भी मंजूरी दे दी है, जिससे साफ है कि मुस्लिम महिला वोटरों पर सरकार की नज़र है।

देश में ऐसी परिस्थितियां बन जाएंगी कि भाजपा अल्पसंख्यक वोटों की फिक्र करेगी, कांग्रेस हिंदुओं को लुभाएगी और संघ प्रमुख भागवत मुसलमानों को हिंदुत्व के लिए ज़रूरी बता देंगे, किसी ने सोचा न था। इन सबके बीच पार्टी के परम्परागत वोटर दुविधा में हैं कि जाएं तो कहां जाएं? अपने ‘कम्फर्ट ज़ोन’ से बाहर निकलकर दूसरे की पिच पर खेलने का दांव इस बार हर नेता खेलता नज़र आ रहा है। ऐसे में किसका दांव लगेगा और कौन बाज़ी हारेगा, यह देखना इस बार बेहद दिलचस्प रहने वाला है।

-सचिन पौराणिक

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