स्वविवेक का उपयोग कर अफवाहों से बचें

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ज्यादा वक्त नहीं बीता, जब गुरुग्राम के प्रद्युम्न हत्याकांड में पुलिस और मीडिया ने हत्या के कुछ घंटों के भीतर ही बस कंडक्टर को अपराधी मानकर उसकी मीडिया ट्रायल शुरू कर दी थी। प्रद्युम्न की उसके स्कूल के ही टॉयलेट में हुई दर्दनाक हत्या से देश स्तब्ध रह गया था| सबके मन मे भारी रोष था, लेकिन गुस्सा अपनी जगह होना चाहिए और जांच के तथ्य अपनी जगह। हालांकि हमने पहले दिन से ही कहा था कि कंडक्टर को पकड़ा ही इसलिए गया है ताकि असली आरोपी को बचाया जा सके। सीबीआई जांच ने भी हमारे दावों की पुष्टि की और स्कूल के ही एक अन्य छात्र को प्रद्युम्न की हत्या में दोषी पाया।

कहने का मतलब इतना ही है कि प्रथमदृष्टया जो जानकारी सामने आती है या यूं कहें कि किसी भी कांड की प्रारंभिक जानकारियां भरोसे करने लायक नहीं होती। उनमें कई अफवाहें होती हैं जो असल में दोषियों को बचाने के लिए फैलाई जाती हैं। प्रद्युम्न सहित ऐसे अनेक केस मिल जाएंगे, जो सीबीआई को जांच सौंपने के बाद सिर के बल पलट गए। ऐसा कई मामलों में हो चुका है, जहां शुरुआत में जिन्हें दोषी समझा जा रहा था, वे पाक साफ निकल आए और आरोप लगाने वाले ही असली गुनहगार पाए गए।

ऐसी ही कुछ बातें अभी कठुआ केस में भी सामने आती जा रही हैं। आसिफ़ा के साथ जिस मंदिर में दुष्कर्म होना प्रचारित किया जा रहा था, अब यह बात सामने आ रही है की उस मंदिर में कोई दरवाजा ही नहीं है इसलिए वहां किसी को छिपाकर रखा ही नहीं जा सकता है। कई दावे ऐसे किए जा रहे हैं की आसिफा से दुष्कर्म मंदिर में हुआ ही नहीं बल्कि एक साजिश के तहत उस मंदिर में उसकी लाश फेंक दी गई और इसी बहाने एक समुदाय विशेष पर निशाना लगाया जा रहा है।

ऐसी बातें भी चल रही हैं कि आसिफा जिस मुस्लिम समुदाय (बक्करवाल गुर्जर) से आती है, उसने हमेशा भारतीय सेना और देश का साथ दिया है। कारगिल घुसपैठ की जानकारी भी इसी समुदाय के लोगों ने सबसे पहले भारतीय सेना को दी थी। इसके अलावा यह वर्ग बिल्कुल भी कट्टर नहीं है और इंसानियत और देशप्रेम को सबसे ऊपर रखता है इसलिए आतंकवादियों को यह समुदाय हमेशा से खटकता आया है। इसलिए यह संदेह वाजिब है कि कहीं यह आसिफा के बहाने आतंकवादियों की कोई साजिश तो नहीं है, जो इस देशभक्त समुदाय के मन में देश के प्रति घृणा का भाव पैदा करने के लिए रची गई हो ?

किसी साजिश का शक इसलिए भी गहरा रहा है क्योंकि जिस तरह से आसिफा का नाम मीडिया में उछाला गया, जिस तरह इस घटना को मजहबी रंग दिया गया और एक दुष्प्रचार के तहत इस केस में बारे में अफवाहें फैलाई गई, वे बातें सामान्य प्रतीत नहीं होती। शक इस बात का भी है कि कहीं अप्रवासी रोहिंग्याओं को देश से भगाने के लिए चलाए जा रहे अभियान से ध्यान भटकाने की कोशिश तो नहीं की जा रही है? कैसे यह मुद्दा संयुक्त राष्ट्र तक पहुंच गया, जबकी दुष्कर्म इस देश में कोई विरली घटना नहीं है।

आसिफा या किसी भी लड़की के साथ दुष्कर्म करने वालों को फांसी की सजा होना चाहिए, इसमें कोई विरोध नहीं है। नारी शक्ति को भारतीय समाज ने मां का दर्जा दिया है और उनके खिलाफ होने वाले हर अपराध में सख्त से सख्त सजा होना चाहिए, चाहे अपराधी किसी भी मत-मजहब का हो। जब तक इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हो जाती तब तक हमें कोई भी राय बनाने से बचना होगा क्योंकि अभी सामने आ रही सभी जानकारियां और दावे संदेह के घेरे में हैं। मीडिया बिना सोचे-समझे इस मुद्दे पर जिस आक्रामकता के साथ गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग कर रहा है, वह भी पत्रकारिता के स्तर के अनुकूल नहीं कही जा सकती है| रामसेतु से लेकर स्वर्ग की सीढ़ियां तक खोज लाने वाला मीडिया वह मंदिर नहीं खोज पा रहा है, जहां आसिफा से दुष्कर्म की बातें कही जा रही है।

राज्य की महबूबा सरकार को इस मामले की जांच जल्द से जल्द सीबीआई को देना चाहिए क्योंकि उनके जांच अधिकारी खुद सवालों के दायरे में है। सिर्फ सीबीआई ही इस मामले की निष्पक्ष जांच कर सकती है, तब तक के लिए हमें स्वविवेक का उपयोग करके अफवाहों से बचना चाहिए और समाज के साम्प्रदायिक सौहार्द को बनाए रखने में योगदान करना चाहिए। पुनः आसिफा के साथ दुष्कर्म से पीड़ित सभी बच्चियों के साथ हम डटकर खड़े है, लेकिन संवेदनाओं की आड़ लेकर देश तोड़ने की कोशिश करने वालों को बेनकाब करना भी जरूरी है।

-सचिन पौराणिक

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