Talented View: क्या क्या बेचना पड़ेगा 5 टन की इकॉनमी के लिए

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एक पुराना चुटकुला है। दूध की दुकान पर हलवाई कड़ाई में दूध उबालते हुए गिलास में दूध लहरा रहा था। एक गिलास से दूसरे गिलास में दूध डालते हुए वो दूध की लंबी-लंबी धार बनाते हुए जा रहा था। ये देखकर एक ग्राहक ने उससे कहा कि- “भैया, 2 मीटर दूध मुझे भी दे दो” ये पुराना चुटकुला आज एकाएक याद आ गया जब गृहमंत्री अमित शाह (Amit Shah says on economy) को ये कहते सुना कि वो देश की इकॉनमी को 5 मिलियन ‘टन’ तक ले जाना चाहतें है।दरअसल अमित शाह एक इंटरव्यू के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 5 ट्रिलियन इकोनॉमी (5 Trillion Indian Economy) वाले लक्ष्य पर बात कर रहे थे। जब अमित शाह (Amit Shah says on economy) इस पर सरकार का पक्ष रख रहे थे तो उन्होंने बीच में जीडीपी को गलती से ‘मिलियन टन’ बता दिया। इस वीडियो में वह बोल रहे हैं कि ‘मुझे भरोसा है कि ये 3 मिलियन टन के बेस पर 5 मिलियन टन जाने के लिए हम बिल्कुल तैयार हैं, देश उस दिशा में आगे जा रहा है।’ बता दें कि अमित शाह यहां 3 ट्रिलियन और 5 ट्रिलियन कहना चाहते थे लेकिन उन्होंने गलती से ‘मिलियन टन’ कह दिया।

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अब ये गलतीं ‘स्लिप ऑफ टंग’ की वजह से हुई या अर्थव्यवस्था जैसे जटिल विषय पर ‘अल्प समझ’ की वजह से इस पर चर्च चल पड़ी है। अगर ये ज़ुबान फिसलने की वजह से हुआ है तो कोई बात नही, नेताओं की ज़ुबान अक्सर फिसल ही जाती है। लेकिन सवाल ये की अगर यही ज़ुबान राहुल गांधी की फिसली होती तो उनकी राजनीतिक समझ के साथ ही उनके व्यक्तित्व पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिए जाते। अगर मिलियन टन अर्थव्यवस्था ‘स्लिप ऑफ टंग’ है तो ‘कुम्भकर्ण लिफ्ट योजना’ और ‘आलू से सोना’ भी ‘स्लिप ऑफ टंग’ माना जा सकता है।लेकिन ऐसी गलतीं शाह या मोदी की तरफ से होती है तो मामला रफादफा कर दिया जाता है और राहुल गांधी की तरफ से होता है तो एक अरसे तक उस पर चुटकुले बनाये जातें है। लेकिन अब कांग्रेस भी सोशल मीडिया पर ऐसी गलतियों को पकड़ने लगी है। इस बयान पर कांग्रेस प्रवक्ता गौरव वल्लभ ने तुरन्त ट्वीट किया कि- “मिलियन टन वाली GDP के बाद अब जल्द ही मुंबई से दिल्ली की दूरी लीटर्स (Ltrs) में मापी जाएगी। किसी ने ठीक ही कहा है, परीक्षा पास करनी हो या फिर देश चलाना हो, रटंत विद्या काम नहीं आती, चीजों को समझना ही पड़ता है।”

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वैसे ये ट्रिलियन और टन की अर्थव्यवस्था से इतर देश के उद्योग-धंधों की हालत सही नही दिखाई दे रही है। आज ही खबर आयी कि प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र में एक कारोबारी ने आर्थिक तंगी की वजह से सपरिवार आत्महत्या कर ली। ऐसी खबरें हृदय विदारक भी है और धरातल के कठिन हालातों को भी दर्शाती है। छोटे व्यापारी हलाकान है वहीं अम्बानी, अडानी जैसे चंद उद्योगपतियों पर सरकार मेहरबान है। हवाई यात्राओं से लेकर रेलवे तक इनके हाथो में सरकार सौंपने की तैयारी में है।निजीकरण से देश को क्या मिलेगा इस पर चर्चा की गुंजाइश है लेकिन इसमें कोई संदेह नही की छोटे व्यापारी-कारोबारियों की स्थिति बहुत तेजी से दयनीय होती जा रही है। सरकार के पास इस बड़े वर्ग की किसी समस्या के लिए कोई समाधान नही है। ऐसे हालातों में आम आदमी को इससे कोई फर्क नही पड़ता कि अर्थव्यवस्था 5 टन की है 5 किलोमीटर की। आम आदमी अपने रोजमर्रा के खर्चो से तालमेल बैठा ले यही उसके लिये बहुत है। बाकी देश की इकॉनमी को 5 टन वजनी बनाने के लिए देश को एयर इंडिया, रेलवे के अलावा और क्या क्या बेचना पड़ेगा ये वक्त बतायेगा।

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Sachin pauranik

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