कहानी: मरने के बाद नहीं माता-पिता के जीते जी ही करें सेवा

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पितृपक्ष पक्ष चल रहा है, इस समय पूर्वजों का तर्पण किया जाता है| उनके लिए खाना बनाकर कौओं को खिलाया जाता है, लेकिन ऐसा सिर्फ भारत में ही क्यों होता है? दुनिया के सबसे बड़े देशों में इस तरह की कोई प्रथा नहीं है तो फिर हमारे देश में ही ऐसा क्यों? आजकल माता-पिता को साथ में रखना ही बच्चों के लिए भार के समान होता है तो फिर उनके मरने के बाद उनकी ऐसी सेवा क्यों, जब हमें यह भी नहीं पता  कि हमारे पूर्वज हमारे द्वारा दिया गया भोजन स्वीकार भी करते हैं या नहीं! यह सब हमारी अपनी भावनाओं पर निर्भर करता है| आज हम आपके लिए एक ऐसी कहानी लेकर आए हैं, जिसे पढ़ने के बाद शायद आप की भी सोच बदल जाए|

मिठाई की दुकान पर दो दोस्त मिले| राम रसगुल्ले और अन्य मिठाई खरीद रहा था, तभी वहां रमेश पहुंचा| राम ने रमेश को बताया कि आज मेरी मां का श्राद्ध है इसलिए मैं उनकी पसंदीदा मिठाई खरीद रहा हूं, उन्हें रसगुल्ले बहुत पसंद हैं| रमेश यह सुनकर आश्चर्यचकित हो गया और राम की ओर अचरज भरी निगाहों से देखने लगा| फिर उसने हंसते हुए राम से कहा, “भाई क्यों मजाक कर रहे हो| हमें ऐसी बात नहीं करनी चाहिए| मैं अभी तुम्हारी मां से मिलकर आ रहा हूं और तुम उनके श्राद्ध की बात कर रहे हो|”

राम यह सुनकर हंसने लगा और उसने रमेश को समझाते हुए कहा, “हम बचपन से देखते आ रहे हैं कि जब हमारे बुजुर्ग का स्वर्गवास हो जाता है, तब जाकर हम उनकी याद में, उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध के समय में उन्हें भोग लगाते हैं| मैं मानता हूं कि मृत्यु के बाद गाय-कौए की थाली में मां के नाम का भोजन रखने से अच्छा है कि मैं उनके जीते-जी ही पसंदीदा भोग खिलाऊं, उनकी हर इच्छा पूरी करूं| जो व्यक्ति माता-पिता के जीवित रहने पर उन्हें खुश नहीं रख सकते, वे उनकी आत्मा को कैसे शांति प्रदान करवा सकते हैं|”

राम ने आगे कहा, “हम मंदिर में भगवान की सेवा करते हैं, उन्हें 56 भोग का प्रसाद चढ़ाते हैं, इससे अच्छा है कि अपने घर के बुजुर्गों की सेवा करें, उनकी इच्छाएं पूरी करें, ऐसा करने से दोगुना पुण्य मिलेगा|” तर्पण का अर्थ तृप्त करना होता है, इसका फल हमें तब ही मिलेगा, जब हम माता-पिता या बुजुर्गों के जीवित रहने के दौरान उनकी सेवा करें|

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