एक हार से सबकुछ ख़त्म नहीं हो जाता है

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जिंदगी में कई मोड़ ऐसे आते हैं, जब इंसान को जीवन के कड़े इम्तिहान देने होते हैं| हर इंसान को किसी न किसी परीक्षा से गुज़रना ही होता है | बचपन से लेकर जवानी और फिर बुढ़ापे तक जीवन में कई उतार-चढ़ाव आते हैं और ये कई परीक्षाएं लेकर सामने खड़े होते हैं | स्कूल-कॉलेज से शुरू हुआ परीक्षाओं का दौर जीवन में हर कदम पर साथ रहता है | इंसान के लिए परीक्षा देने का एक ही ध्येय है जीत या कामयाबी | होना भी चाहिए, लेकिन इसी सोच के साथ जब हम किसी परीक्षा में नाकामयाब हो जाते है तो खुद को जिम्मेदार मानते हुए सब कुछ ख़त्म सा मान लेते हैं|

उदासी और हताशा हमें घेरने लगती है | नाकामयाबी चीज ही ऐसी है, जो हर किसी को नापसंद होती है और जब हिस्से में आती है तो बड़ी तकलीफ देती है, लेकिन यहां हारकर बैठ जाने से बेहतर है नई शुरुआत करना | आसान नहीं है परन्तु यदि खुद को ज़रा सा समय दिया जाए, हालत को संभाला जाए और फिर से शुरुआत की जाए तो शायद बात बन जाए |

बात यहां यह भी समझने वाली है कि यदि कामयाबी बनी है तो उसके लिए किए गए प्रयासों की कमी का आईना दिखाने के लिए नाकामयाबी भी बनी है | सकारात्मक सोच के साथ हम नाकामयाबी को भी अगली सफलता का ज़रिया बना सकते हैं| खासकर आज की युवा पीढ़ी को यह बात समझाना बेहद कठिन होता जा रहा है कि जिंदगी हमेशा अपने हिसाब से नहीं चलती , वो चलती है उसकी गति और उसी के अंदाज से |

हम सिर्फ प्रयास मात्र कर सकते हैं| हां, प्रयास के किये जाने का तरीका, शिद्दत और दिशा असफलता और सफलता  के बीच की खाई को पाट सकने में हमारी मदद करते हैं | कहने का मतलब है कि राह की ठोकर से गिर जाने का मतलब दौड़ का ख़त्म होना नहीं होता | फिर से उठकर आगे निकलने की कोशिश का नाम ही है जिंदगी | याद रहे कि एक हार से सब कुछ ख़त्म नहीं होता |

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