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बोये जाते हैं बेटे, उग आती हैं बेटियां..!

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उसकी नई-नई शादी हुई थी, जिससे वह बहुत खुश थी। सुमन के पति के घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। जमीन थी, पशु थे, गांव के संपन्न लोगों में उनकी गिनती होती थी। सुमन के माता-पिता के नहीं रहने पर उसके दो बड़े भाइयों ने ही उसका ब्याह रचाया था। सुमन भी अच्छा परिवार मिलने पर फूले नहीं समाती थी। वह अपने पति और ससुराल वालों के साथ बहुत खुश थी। समय के साथ उसने एक सुंदर बेटे को जन्म दिया। इससे उनके परिवार में और खुशहाली छा गई|

परिवार में एक नए मेहमान के आने से सब बहुत खुश हुए। मुन्ने के जन्म की खुशी में पूरे गांव को न्योता दिया गया, उत्सव मनाया गया। मुन्ना धीरे-धीरे बड़ा होने लगा| पति की गोद में बच्चे को खेलते देख उसे बहुत खुशी मिलती थी। पति भी सुमन और बच्चे को किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने देता था। एक दिन अचानक उसकी खुशियों पर शायद किसी की नजर लग गई। उसके पति को एक रात कुछ घबराहट महसूस हुई। घरवाले डॉक्टर को दिखाते, उससे पहले उसकी सांसें थम गई। कोई कुछ समझ पाता, उससे पहले घर में मातम छा गया। पूरा गांव इस मौत पर हैरान और दुखी था। वह बेचारी अपने रोते हुए बच्चे को दूध पिलाते हुए सोच भी नहीं पा रही थी कि अचानक यह क्या हो गया? अब आगे उसका और बच्चे का क्या होगा?

पति की मौत के सदमे से वह उबर भी नहीं पाई थी कि ससुराल वालों के एकाएक बदले व्यवहार से उसे दूसरा झटका लगा। कल तक सबकी लाड़ली बहू और उसका प्यारा सा बच्चा अब सबकी उपेक्षा का शिकार था। धीरे-धीरे गांव वालों की सहानुभूति भी खत्म हो गई। उसके पति की मौत को भुलाकर सब अपने कामों में लग चुके थे। जल्दी ही वह समझ गई कि गांव के इस घर में अब उसका और बच्चे का गुजारा संभव नहीं है। कलेजे पर पत्थर रखकर वह अपने बच्चे के साथ मायके आ गई।

सुमन ने शायद सोचा होगा कि भाइयों के साथ रहने से मुन्ने को अकेलापन नहीं लगेगा और उसकी परवरिश अच्छे से हो जाएगी, लेकिन सुमन की यह सोच जल्द ही उसका एक भ्रम साबित हुई। उसे मुन्ने के साथ मायके आया देखकर भाभियों ने पहले ही मुंह बना लिया। कई बार भाभियों की खुसुर-पुसुर की आवाजें सुमन के कानों में पड़ी, जिसमें वे अपने पति से कह रही थी कि खुद के खर्चे संभल नहीं रहे, ऊपर से तुम्हारी बहन भी आ गई अपने बच्चे को लेकर। कैसे गुजारा होगा इनका? एक बार शादी करवा दी, अब क्या जिंदगीभर इसका भार हम ही उठाएंगे?

सुमन को यह बातें सुनकर बेहद दुख हुआ, लेकिन बाकी दरवाजे उसके लिए पहले ही बंद हो चुके थे। उस रात उसे नींद नहीं आई। कभी वह पति की तस्वीर को देखती तो कभी पास में सोये हालातों से बेखबर बच्चे को। विचारों की कभी खत्म न होने वाली लड़ी से जूझते हुए ही उसकी रात गुजरी। आखिरकार उसने हिम्मत न हारते हुए परिस्थितियों से लड़ने का फैसला किया। उसने मन ही मन कुछ निश्चय किया और माता-पिता की दी हुई शिक्षा का सही उपयोग करने की सोची।

पढ़ी-लिखी तो वह थी ही, इसलिए सुमन ने अगले दिन ही गांव के निजी स्कूल में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। वहां पैसे जरूर कम मिलते थे, लेकिन वह घर खर्च के कुछ पैसे भाभियों को देने के बाद भी कुछ बचत करने में सफल हो ही जाती थी। अपने और बच्चे के भविष्य के लिए सुमन मेहनत करने में कभी पीछे नहीं हटी। उसकी मेहनत औए लगन को देखते हुए स्कूल में सभी उसकी तारीफ करते थे। घरखर्च के पैसे मिलने से उसके प्रति भाभियों का व्यवहार भी थोड़ा बदला। समय पंख लगाकर उड़ता चला और कुछ सालों बाद सुमन ने अपनी बचत से खुद के लिए एक छोटा प्लॉट खरीद लिया। सोचा कि कुछ साल और मेहनत करके थोड़े पैसे और इकट्ठे करके 2 कमरे बनवा लेगी।

इधर समय की बदली करवट से दोनों भाइयों को व्यापार में बड़ा नुकसान पहुंचा और वे पैसों के लिए मोहताज हो गए। बढ़ते कर्ज के कारण वे सुमन पर पैसों के लिए दबाव बनाने लगे। जब बात ज्यादा आगे बढ़ने लगी तो सुमन ने एक किराये का कमरा लेकर अपने बच्चे के साथ वहां रहना शुरू कर दिया। अपने कार्यक्षेत्र में लगातार मेहनत कर सुमन एक दिन उस स्कूल की प्रिंसिपल बन गई। लोन लेकर उसने उस प्लॉट पर एक छोटा घर भी बना लिया और बच्चे का दाखिला इंजीनियरिंग कॉलेज में भी करवा दिया। एक दिन गांव के किसी पहचान वाले ने उसे बताया कि उसके भाइयों ने बढ़ते कर्ज के चलते अपना पुश्तैनी मकान बेच दिया है और एक किराये के घर में रहने लगे हैं।

यह जानते ही सुमन तुरन्त भाइयों से मिलने पहुंची। उनकी हालत देखकर उसे रोना आ गया और वह उन्हें अपने घर चलकर रहने के लिए कहने लगी। यह सुनकर दोनों भाइयों की आंखों से आंसू बहने लगे। वे बोले, हमने तुम्हें इतना सताया और तुम हमें अपने घर ले जाने आई हो। सुमन बोली, नहीं भैया! यह मेरा नहीं आपका ही घर है। आप चलिए और वहां सब मिलकर रहेंगे। सुमन के इतना कहते ही दोनों भाभियों की भी आंखें नम हो गई। किराये का घर छोड़कर वे सुमन के घर रहने आ गए। स्वर्ग से यह सब देखकर उनके माता-पिता भी यही सोच रहे थे कि धन्य है हमारी बेटी..!

सुमन जैसी बेटियां घर-परिवार के साथ ही इंसानियत के लिए भी एक उपहार है। बेटियों के कभी हार न मानने के इस जज़्बे को आज ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ के मौके पर दिल से सलाम.. आप हैं तभी तो हम हैं..

-सचिन पौराणिक

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